MP सरकार का नया फरमान: अब अधिकारी इकोनॉमी क्लास में उड़ेंगे और Zoom पर मीटिंग करेंगे!

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By #JournalistVijay

भई, वाह! मध्य प्रदेश सरकार (Mohan Yadav Sarkar) ने आखिरकार ‘फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (यानी सरकारी खजाने को संभालने) की ठान ली है। खबर है कि सरकार ने अधिकारियों की ऐश-ओ-आराम पर लगाम कसने के लिए कुछ बहुत ही सख्त और ‘मजेदार’ उपाय लागू किए हैं। अब से, सरकारी बाबू लोग फाइव-स्टार होटलों (Five Star Hotels Meeting) में मीटिंग नहीं कर पाएंगे, और हवाई यात्रा पर भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं।

‘किफायती’ दौर की शुरुआत

सुनकर अच्छा लगा कि सरकार को याद आया कि सरकारी खजाना जनता का पैसा है, न कि कोई असीमित डेबिट कार्ड। नए नियमों के मुताबिक, अधिकारी अब बिजनेस क्लास की जगह इकोनॉमी क्लास में सफर करेंगे। जी हां, वही आम आदमी वाली सीट, जहां पैर फैलाने की जगह कम होती है और कोहनी के लिए जंग लड़नी पड़ती है। शायद अब हमारे अधिकारियों को भी आम जनता के सफर का अहसास हो सकेगा।

इसके अलावा, आलीशान होटलों में होने वाली सरकारी मीटिंगों पर भी रोक लगा दी गई है। अब ये बैठकें या तो सरकारी दफ्तरों में होंगी, या फिर—जैसा कि हम सभी को उम्मीद है—वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए। यह कदम न केवल किराए के महंगे बिल बचाएगा, बल्कि उन अनगिनत बुफे लंच और डिनर को भी कम करेगा जो अक्सर इन मीटिंगों का ‘मुख्य आकर्षण’ होते थे।

एडमिनिस्ट्रेटिव मॉडर्नाइजेशन या ‘डिजिटल इंडिया’ का असर?

मैं एक जर्नलिस्ट हूं, और मेरा काम इन ‘पॉलिसी शिफ्ट्स’ को बारीकी से देखना है। यह कदम सिर्फ पैसे बचाने के बारे में नहीं है; यह एक क्लासिक उदाहरण है जिसे मैं ‘एडमिनिस्ट्रेटिव मॉडर्नाइजेशन’ (प्रशासनिक आधुनिकीकरण) कहना पसंद करूंगा।

आखिरकार, कोरोना काल ने हमें सिखाया कि जो मीटिंगें घंटों तक चल सकती थीं और जिनके लिए लोगों को देश भर से बुलाया जाता था, वे सब एक सिंपल से Zoom या Microsoft Teams कॉल पर भी हो सकती हैं। सरकार का यह कदम यह दिखाता है कि वे भी अब 21वीं सदी में कदम रखने को तैयार हैं। डिजिटल टूल्स का उपयोग करना न केवल पेपरवर्क कम करता है, बल्कि public expenditure (सार्वजनिक व्यय) में भारी कटौती करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

बॉटम लाइन यह है: यह बदलाव बहुत पहले हो जाना चाहिए था, लेकिन देर आए दुरुस्त आए। अगर हमारे अधिकारी फाइव-स्टार होटलों में खाने के बजाय सरकारी कैंटीन की चाय पीकर और बिजनेस क्लास के बजाय इकोनॉमी क्लास में उड़कर जनता के करोड़ों रुपये बचा सकते हैं, तो यह एक स्वागत योग्य कदम है।

अब असली सवाल यह है: क्या यह ‘किफायतीपन’ सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा, या वाकई में हमारी सरकारी कार्यप्रणाली में एक स्थायी बदलाव लाएगा? आपकी क्या राय है? कमेंट्स में बताएं!

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