मिडिल ईस्ट का ‘महा-नाटक’: क्या हम सब बस इस वॉर-गेम के NPC हैं?

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By #JournalistVijay

सच कहूं तो, आज की दुनिया बस तीन चीजों पर टिकी है—हाई-स्पीड इंटरनेट, कैफीन, और बिना सिर-पैर के होने वाली जियो-पॉलिटिकल ड्रामाबाजी। मिडिल ईस्ट पिछले कई दशकों से “दुनिया को पैनिक मोड में कैसे रखें” का मास्टरक्लास चला रहा है, और लगता है अब उन्होंने एक्स्ट्रा क्लासेज शुरू कर दी हैं।

ताजा मामला? जॉर्डन में अमेरिकी बेस पर हमला। रिपोर्ट्स हैं, कुछ जवान घायल हुए हैं, और पूरी दुनिया की मीडिया ऐसे रिएक्ट कर रही है जैसे दुनिया खत्म होने वाली है। सच तो यह है कि यह किसी वॉर से ज्यादा एक बहुत ही महंगा, बहुत ही लाउड और बहुत ही बकवास वाला ‘डिप्लोमैटिक ड्रामा’ है।

‘रोबस्ट गेस्चर’ का असली मतलब

आजकल अगर आपको अपने पड़ोसी से बात करनी हो, तो आप उसे डीएम करेंगे या फोन करेंगे। लेकिन मिडिल ईस्ट में? वहां के पावर प्लेयर्स को लगता है कि अगर उन्हें अपनी नाराजगी दिखानी है, तो पड़ोसी के लिविंग रूम में एक मिसाइल दागना ही सबसे बेस्ट तरीका है। मतलब, कोई लॉजिक है? डिप्लोमेसी, ट्रीटीज और शांति की बातें सब गई भाड़ में। एक ड्रोन उड़ाओ और कहो— “भाई, मैं आज बहुत गुस्से में हूं!”

और इस पूरे खेल का ‘collateral damage’? वही बेचारे जवान, जो उन लोगों की वजह से पिस रहे हैं जो शायद ही कभी अपनी एसी वाली ऑफिस से बाहर निकलते हों। ये लोग वहां बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए डिबेट करते हैं कि “इसे ‘वॉर’ बोलें या ‘रोबस्ट गेस्चर ऑफ डिसअप्रूवल’?” ये वैसा ही है जैसे कोई अपना ही घर फूंक दे ये साबित करने के लिए कि फायर ब्रिगेड के आने में 5 मिनट की देरी हुई है। विचित्र, है ना?

ग्लोबल सप्लाई चेन: एक ‘एंजायटी’ वाला पेशेंट

मैं एक जर्नलिस्ट हूं, और मेरा काम है इस सर्कस को दूर से देखना। और मैं जो देख रहा हूं, वो ये है कि दुनिया लॉजिक से नहीं, बल्कि उन लोगों के मूड स्विंग्स से चल रही है जिन्हें स्टेबिलिटी से एलर्जी है।

असली टेंशन तो तब होती है जब इसका असर आपकी पॉकेट पर पड़ता है। मिडिल ईस्ट में एक ड्रोन उड़ता है, और यहां आपके पेट्रोल और खाने-पीने के दाम आसमान छूने लगते हैं। ग्लोबल सप्लाई चेन? यह उस इंसान की तरह है जिसे क्रॉनिक एंजायटी है और उसे हाथ में कांच का फूलदान लेकर माइंडफील्ड (बारूदी सुरंग) से गुजरना पड़ रहा है। मिडिल ईस्ट में किसी ने छींक मारी, और यहां आपके कुकिंग ऑयल से लेकर गैजेट्स तक सब महंगे हो गए।

अभी हाल ही में जो हलचल हुई है, उसने दिखा दिया है कि ये “ग्लोबलाइजेशन” कितनी कच्ची डोर से बंधी है। दुनिया भर की एनर्जी मार्केट एक ऐसे स्ट्रीट परफॉर्मर की तरह रिएक्ट कर रही है जिसकी जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं है—हर अफवाह पर पैनिक और हर न्यूज़ पर ड्रामा!

क्या हम सब ‘NPCs’ हैं?

हम उस दौर में हैं जहां हमारे पास दुनिया का सारा ज्ञान और इंटरनेट है, लेकिन एक-दूसरे को समझने की अक्ल जीरो है। हम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सिर्फ नफरत और मिसअंडरस्टैंडिंग फैलाने के लिए कर रहे हैं।

पुराने जमाने में राजा अपनी बोरियत मिटाने के लिए जंग लड़ते थे, और प्रजा को पिसना पड़ता था। आज राजा बदल गए हैं—अब वे कमेटियां, रिजीम्स और ग्लोबल पावर्स हैं—लेकिन गेम वही पुराना और घटिया है। बस भाषा बदल गई है। अब हम “जंग” नहीं, “स्ट्रैटेजिक इंटरेस्ट” या “जियो-पॉलिटिकल स्टेबलाइजेशन” की बात करते हैं। शब्द कितने भी फैंसी क्यों न हों, काम वही है—अपनी ईगो को बड़ा दिखाना।

बॉटम लाइन यह है: जब ये बड़े खिलाड़ी रेगिस्तान में अपने वीडियो गेम खेल रहे होते हैं, तो नुकसान हमारा-आपका होता है। आप पेट्रोल पंप पर खड़े होकर यह प्रार्थना कर रहे होते हैं कि आपकी टंकी फुल होने से पहले दाम और न बढ़ जाएं।

हम इंसान भी ना… अजीब हैं। हमें पता है कि आग जल रही है, हमें पता है कि हाथ जल जाएगा, फिर भी हम उंगली डालकर देखेंगे कि— “देखते हैं, कितनी गरम है!”

तो दोस्तों, फिलहाल तो मिडिल ईस्ट का ये ‘सीजन’ लंबा चलने वाला है। अपनी चाय की चुस्की लीजिए, न्यूज़ हेडलाइंस को स्क्रॉल कीजिए, और बस ये उम्मीद कीजिए कि आपका वॉलेट इस ‘जियो-पॉलिटिकल’ झटके को झेल ले।

आपका इस बारे में क्या सोचना है? क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया ने इन प्रॉक्सी वॉर्स के प्रति हमारे ‘एटीट्यूड’ को बदल दिया है? कमेंट्स में बताएं!

Vijay Mishra
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विजय मिश्रा, जिन्हें मीडिया जगत में #JournalistVijay के नाम से जाना जाता है, ज़मीनी पत्रकारिता के एक निर्भीक, संवेदनशील और जन-उन्मुख संवाहक हैं। पत्रकारिता उनके लिए कोई आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक दायित्व और जनसेवा का एक सशक्त माध्यम है। पेशागत रूप से दो दशकों (20+ वर्ष) के अनुभव वाले एक वरिष्ठ आईटी और ईआरपी (ERP) विशेषज्ञ होने के नाते, वे अपनी पेशेवर आजीविका आईटी क्षेत्र से अर्जित करते हैं। यही आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें बिना किसी दबाव, प्रलोभन या व्यावसायिक पक्षपात के बेबाक और निष्पक्ष पत्रकारिता करने की अद्वितीय ताकत देती है।ज़मीनी पत्रकारिता और जन-सरोकार विजय मिश्रा की पत्रकारिता एसी कमरों या स्टूडियो की बहसों तक सीमित न रहकर सीधे सड़कों, गांवों और चौपालों तक पहुंचती है। मध्य प्रदेश की राजनीतिक धारा, मतदाताओं की बदलती सोच और ज़मीनी हकीकत पर उनकी गहरी पकड़ है। जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण वे आम मानस की नब्ज को बखूबी समझते हैं।उनकी पत्रकारिता का मुख्य केंद्र बिंदु प्रशासनिक तंत्र की खामियों को उजागर करना और अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है:नल-जल योजना व हर घर जल में भ्रष्टाचार: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल संकट, पाइपलाइन बिछाने में हुई धांधलियों और 'हर घर नल योजना' के धरातल पर अधूरे वादों को उजागर करना।पीएम आवास योजना और राशन व्यवस्था: गरीबों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं जैसे 'प्रधानमंत्री आवास योजना' और 'राशन कार्ड' वितरण में होने वाली लालफीताशाही, कमीशनखोरी और धांधली की सीधी ग्राउंड रिपोर्टिंग।सत्ता और नीति-निर्माताओं से सीधे सवाल: नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं से सीधी मुलाकात कर उनसे जनता के ज्वलंत मुद्दों पर कड़े, तर्कसंगत और तीखे सवाल पूछना।हरिशंकर परसाई शैली का प्रभाव और व्यंग्यात्मक लेखन समय के साथ, विजय मिश्रा हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की लेखन शैली से गहराई से प्रभावित हुए हैं। वे परसाई जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी रिपोर्टिंग और आलेखों में तल्ख व्यंग्य (Satire) का प्रयोग करते हैं।राजनीतिक पाखंड, प्रशासनिक सुस्ती और सामाजिक विडंबनाओं पर प्रहार करने के लिए वे तीखे व्यंग्यात्मक तर्कों का सहारा लेते हैं। उनका मानना है कि जो बात सीधी रिपोर्टिंग से कभी-कभी दब जाती है, उसे व्यंग्य के जरिए तंत्र के ज़मीर को झकझोरने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।तकनीकी दक्षता और निष्काम समाज सेवा पत्रकारिता में उनका प्रवेश भले ही किसी विशेष परिस्थिति या सामाजिक परिस्थितियों की देन (Compulsion) रहा हो, लेकिन आज वे अपने खाली समय का उपयोग पूरी तरह से समाज-हित में करते हैं।निःस्वार्थ पत्रकारिता: पत्रकारिता से धन कमाना उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। वे अपनी आईटी पृष्ठभूमि के माध्यम से सम्मानित आजीविका कमाते हैं और पत्रकारिता के जरिए केवल पीड़ितों, वंचितों और आम जनता की मदद करते हैं।डेटा और तकनीक का उपयोग: एक वरिष्ठ आईटी पेशेवर होने के कारण वे डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल टूल्स और तकनीकी तथ्यों का उपयोग कर अपनी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक और अकाट्य बनाते हैं।विजय मिश्रा की पत्रकारिता तकनीक, व्यंग्य, ज़मीनी जुड़ाव और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक ऐसा विरल मिश्रण है, जो आम जनता के लिए उम्मीद की एक किरण और व्यवस्था के लिए एक सतर्क प्रहरी का काम करती है।

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