Written by: #JournalistVijay | TKN Prime News
हमारे देश में सुशासन एक ऐसी चिड़िया का नाम है, जो सिर्फ सरकारी विज्ञापनों के घने जंगलों में पाई जाती है। आम आदमी जीवन भर अपनी गुलेल लेकर घूमता रहता है, लेकिन उसे इस चिड़िया के दर्शन कभी नहीं होते। मध्य प्रदेश की धरती वैसे भी चमत्कारों की भूमि रही है। यहाँ कभी व्यापमं का जिन्न निकलता है, तो कभी रीवा की सड़कों पर पुलिस की सरपरस्ती में कोरेक्स सिरप की गंगा बहती है। ब्लड बैंकों में खून की जगह पानी और पैसे का ऐसा खेल चलता है कि यमराज भी शरमा जाएं।
लेकिन हमारी मोहन सरकार परम प्रतापी है। जब सरकार को लगा कि उनसे अपनी खुद की गढ़ी हुई ‘सुशासन की चिड़िया’ नहीं संभल रही, तो उन्होंने सीधे देश के सबसे बड़े मीडिया घराने को बुलाया और कहा—“सुनो भाई, यह जो हमारी जनता है न, यह बहुत रोती है। कभी पानी मांगती है, कहीं सड़क के गड्ढे दिखाती है। हमारी अपनी हेल्पलाइन तो कान में तेल डालकर सो रही है, तुम ऐसा करो कि अपना एक ऐप लॉन्च कर दो। हम अपने सारे साहब-सुबों, पटवारियों और कलेक्टर्स को तुम्हारी ड्युटी पर लगा देते हैं।”
और इस तरह, बड़े गाजे-बाजे के साथ अवतरित हुआ—‘भास्कर समाधान’ (Bhaskar Samadhan)।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने फीता काटा, स्टेट एडिटर ने मुस्कुराते हुए कैमरे के सामने पोज दिया और घोषणा कर दी गई कि अब सरकार और जनता के बीच ‘डिजिटल सेतु’ बन गया है। पहले चरण में भोपाल और इंदौर के भाग्यशाली पाठकों को अपनी छाती पीटने का डिजिटल अधिकार मिला है। इस अद्भुत, अकल्पनीय और परम पवित्र विवाह को देखकर दिल बाग-बाग हो गया। परसाई जी अगर आज होते, तो अपनी टूटी हुई चप्पल ठीक करते हुए कहते—“बेटा, जब राजा अपनी प्रजा की फरियाद सुनने के लिए किसी बनिए की दुकान पर गद्दी बिछा ले, तो समझ लेना कि राजा अब केवल मुकुट संभालने का काम कर रहा है, राज तो तराजू वाले ही चला रहे हैं।”
निजी ऐप की गुलामी और सरकारी संप्रभुता का विसर्जन
पहला और सबसे बुनियादी सवाल यह है कि आखिर देश के संविधान की कसम खाकर कुर्सी पर बैठी सरकार को किसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के ऐप के सामने साष्टांग दंडवत करने की जरूरत क्यों पड़ी? मुख्यमंत्री जी ने बड़े गर्व से कहा कि ‘भास्कर समाधान’ पर अधिकारियों को ‘अथॉरिटी व्यू’ (Authority View) दिया गया है। यानी अब जो काम कलेक्टर साहब को सरकारी दफ्तर में बैठकर, जनता की फाइलें देखकर करना था, वह काम अब वे सुबह-शाम दैनिक भास्कर का ऐप खोलकर करेंगे।
यह दृश्य कितना मनोरम होगा! एक तरफ जिला दंडाधिकारी (DM) महोदय बैठे हैं, जिनके कंधे पर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी है। दूसरी तरफ उनके मोबाइल पर ‘टुक-टुक’ की आवाज आती है। वे देखते हैं कि वार्ड नंबर 45 के रामभरोसे ने फोटो डाला है कि उनके घर के सामने नाली चोक है। कलेक्टर साहब तुरंत पूरे अमले को फोन लगाते हैं—“अरे ओ कमिश्नर, जल्दी देखो! भास्कर ऐप पर शिकायत आई है, वरना कल सुबह पहले पन्ने पर अपनी तस्वीर छप जाएगी!”
पैरेलल गवर्नेंस का नया मॉडल: जब सरकार खुद स्वीकार कर लेती है कि उसके अपने विभाग, उसके अपने मंत्री और उसके अपने सचिव इस लायक नहीं बचे कि वे जनता की बात सुन सकें, तब वह व्यवस्था का आउटसोर्सिंग कर देती है। यह ‘पैरेलल गवर्नेंस’ (समानांतर सरकार) नहीं तो और क्या है? जनता ने वोट देकर सरकार चुनी थी, या दैनिक भास्कर का सब्सक्रिप्शन लिया था? कल को अगर पुलिस विभाग अपनी एफआईआर (FIR) दर्ज करने का काम किसी प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के ऐप को दे दे, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इस पूरे तमाशे में सबसे खतरनाक खेल है ‘डेटा सिक्योरिटी’ का। एक आम नागरिक जब अपनी शिकायत दर्ज कराएगा, तो वह अपनी लोकेशन साझा करेगा, अपना मोबाइल नंबर देगा, अपनी पहचान बताएगा। यह सारा बहुमूल्य डेटा किसी सरकारी लॉकर में नहीं, बल्कि एक प्राइवेट कंपनी के सर्वर पर जाकर जमा होगा। आज के जमाने में डेटा ही सोना है, डेटा ही चांदी है। सरकार ने मुफ्त में अपनी जनता का पूरा का पूरा बही-खाता एक मीडिया हाउस की झोली में डाल दिया। इसे कहते हैं—”आम के आम, और गुठलियों के दाम।”
‘भास्कर’ का व्यापार: सुशासन की आड़ में नोट छापने की मशीन
सरकारी पक्ष का कहना है कि यह “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप” (PPP) के तहत जनहित में उठाया गया कदम है, लेकिन कोई भी समझदार नागरिक यह जानता है कि दैनिक भास्कर कोई चैरिटी संस्था नहीं है जो समाज सेवा के लिए करोड़ों का ऐप बनाकर बैठी है। वह एक विशुद्ध व्यावसायिक संस्थान है, जिसका धर्म है मुनाफा कमाना। इस ‘भास्कर समाधान’ से भास्कर को जो लॉटरी लगी है, उसका अंदाजा किसी सीधे-साधे नागरिक को नहीं हो सकता।
आइए इस व्यापारिक गणित को थोड़ा परसाई मार्का चश्मे से समझते हैं:
- यूजर बेस की सुनामी (User Base Ki Sunami): भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में लाखों लोग रहते हैं। हर दूसरे घर में कोई न कोई समस्या है। अब इन समस्याओं को सुलझाने का एकमात्र तरीका क्या बताया गया? “भास्कर ऐप डाउनलोड करो।” यानी सरकार खुद अपनी जनता को लाठी लेकर हांक रही है कि जाओ और उस प्राइवेट ऐप को डाउनलोड करो। चंद दिनों में भास्कर के डाउनलोड्स की संख्या आसमान छूने लगेगी।
- विज्ञापनों की चांदी: जैसे ही ऐप पर交通 (ट्रैफिक) बढ़ेगा, कॉरपोरेट कंपनियां विज्ञापन देने के लिए लाइन लगा लेंगी। ऐप के पास नागरिकों का क्षेत्रवार डेटा होगा। उन्हें पता होगा कि किस इलाके के लोग अमीर हैं, कहाँ के लोग मध्यमवर्गीय हैं। इस डेटा का उपयोग टारगेटेड मार्केटिंग के लिए किया जाएगा। आपकी समस्या का समाधान हो या न हो, लेकिन आपके मोबाइल पर नए वाशिंग मशीन और कार के विज्ञापन जरूर तैरने लगेंगे।
- ब्रांड वैल्यू का शिखर: जब सूबे का मुख्यमंत्री खुद आकर आपके ऐप की ब्रांडिंग करे, तो मार्केट में आपकी साख शेयर बाजार के सेंसेक्स की तरह ऊपर भागती है। भास्कर अब पूरे देश में छाती ठोककर कह सकता है कि “हम सिर्फ अखबार नहीं हैं, हम तो सरकार के दामाद हैं। हमारे एक इशारे पर पूरी सरकारी मशीनरी नाचती है।”
सरकारी तंत्र की कबर पर खड़ा ‘डिजिटल तमाशा’ | Sarkari Tamasha
प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि इस नए डिजिटल माध्यम से शिकायतों का निवारण तेज़ होगा। लेकिन सवाल यह है कि मध्य प्रदेश सरकार के पास जनता की बात सुनने के लिए पहले से ही साधनों की पूरी फौज मौजूद थी। सरकार के पास ‘सीएम हेल्पलाइन 181’ है, जिस पर हर साल जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जाता है। इसके अलावा ‘डायरेक्ट 112’ है, ‘जनसुनवाई’ के कड़क दफ्तर हैं, और न जाने कितने सरकारी पोर्टल्स की फौज खड़ी है।
लेकिन इन सरकारी हथियारों की धार का आलम यह है कि ये सिर्फ कागजों पर चलते हैं। ‘सीएम हेल्पलाइन 181’ की हकीकत यह है कि यदि आपने वहाँ कोई शिकायत दर्ज करा दी, तो निचले स्तर के अधिकारी आपके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य समस्या को हल करना नहीं, बल्कि शिकायत को ‘फोर्स क्लोज’ (जबरन बंद) करवाना होता है। वे शिकायतकर्ता को धमकाते हैं, उस पर दबाव बनाते हैं कि “मियां, शिकायत वापस ले लो, वरना अगली बार राशन कार्ड कटवा देंगे।”
मध्य प्रदेश की प्रमुख अप्रभावी सरकारी डिजिटल योजनाएं:
| सरकारी व्यवस्था / डिजिटल सेवा | कागजी उद्देश्य (जो विज्ञापनों में दिखता है) | धरातल की हकीकत (जो जनता भुगतती है) |
| सीएम हेल्पलाइन 181 CM Helpline | मुख्यमंत्री सीधे आपकी समस्या सुनेंगे और हल करेंगे। | बाबू और पटवारी फोन करके शिकायत वापस लेने का दबाव बनाते हैं, बिना काम किए फाइल बंद हो जाती है। |
| इंदौर/भोपाल 311 ऐप Indore App | नगर निगम की समस्याओं का तुरंत ऑनलाइन निवारण। Nagar Nigam | ऐप पर स्टेटस ‘सॉल्व्ड’ दिखा दिया जाता है, जबकि जमीन पर कचरा और गड्ढा जस का तस रहता है। |
| एमपी ऑनलाइन पोर्टल MP Online | नागरिकों को घर बैठे सरकारी सेवाएं और प्रमाण पत्र देना। | सर्वर हमेशा डाउन रहता है। कियोस्क संचालक तय फीस से दोगुनी वसूली करते हैं। |
| ई-नगरपालिका पोर्टल e-nagarpalica portal | जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र और टैक्स भुगतान का सरलीकरण। Janm-Mrityu Pramand Patra | एक अदद सर्टिफिकेट के लिए नगर निगम के बाबू के दस चक्कर काटने पड़ते हैं। |
| भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन Helpline | घूसखोर अधिकारियों की शिकायत के लिए सीधी लाइन। | आम आदमी शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता; फाइलें लालफीताशाही में दफन हो जाती हैं। |
जब सरकार के पास इतनी बड़ी डिजिटल और प्रशासनिक फौज पहले से मौजूद है, तो वह अपनी इस फौज को ईमानदार और मुस्तैद बनाने के बजाय एक निजी ऐप के सामने घुटने क्यों टेक रही है? असल बात यह है कि सरकार खुद अपने सिस्टम को सुधारने की नीयत नहीं रखती। अपने सिस्टम को सुधारने के लिए कड़े फैसले लेने पड़ते हैं, बाबुओं की ट्रांसफर-पोस्टिंग के धंधे को बंद करना पड़ता है, और सबसे बड़ी बात—अधिकारियों से उनकी जवाबदेही मांगनी पड़ती है। जब यह सब करने की इच्छाशक्ति न हो, तो सबसे आसान तरीका होता है—“चलो, किसी प्राइवेट वाले को पार्टनर बना लेते हैं, तमाशा भी हो जाएगा और अपनी खाल भी बच जाएगी।”
केवल Bhaskar Samadhan ही क्यों? क्रोनी कैपिटलिज्म (Crony Capatalism) की सुरीली तान
यहाँ एक बहुत ही सीधा, निष्पक्ष और कानूनी सवाल उठता है—आखिर ‘भास्कर’ में ऐसा क्या सुरखाब का पर लगा था कि सरकार ने केवल उसी को चुना? मध्य प्रदेश में और भी अखबार हैं, न्यूज़ चैनल्स हैं, डिजिटल पोर्टल्स हैं। क्या सरकार ने इस ‘डिजिटल सेतु’ के निर्माण के लिए कोई खुला टेंडर निकाला था? क्या कोई विज्ञापन जारी किया गया था कि जो भी टेक कंपनी या मीडिया हाउस सबसे बेहतरीन और सुरक्षित प्लेटफॉर्म देगा, हम उसे यह जिम्मेदारी सौंपेंगे?
जवाब है—बिलकुल नहीं। यह पूरा सौदा बंद कमरों में, मखमली सोफों पर बैठकर तय हुआ लगता है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (साठगांठ वाली पूंजीवादी व्यवस्था) कहते हैं। जब सत्ता और पूंजीपति आपस में हाथ मिला लेते हैं, तो नियम-कायदे और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ जाती हैं। सरकार ने बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के एक निजी कंपनी को यह विशेषाधिकार दे दिया कि वह सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल अपने ऐप को चमकाने के लिए करे। यह अन्य मीडिया घरानों के साथ भी सरासर अन्याय है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन भी।
नियत का खोट: जब दिल में न हो दर्द, तो ऐप क्या करेगा वैद्यराज?
CM Mohan Yadav जी का तर्क है कि इस पारदर्शिता से अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जो अधिकारी सरकारी पोर्टल पर काम नहीं कर रहा था, जो बाबू टेबल के नीचे से गांधी जी का नोट लिए बिना फाइल आगे नहीं सरका रहा था, वह भास्कर का ऐप देखते ही अचानक राजा हरिश्चंद्र कैसे बन जाएगा? क्या भास्कर ऐप डाउनलोड करते ही अधिकारियों के भीतर का सोया हुआ ‘इंसान’ और ‘कर्तव्यबोध’ अचानक जाग उठेगा?
व्यवस्था में जब तक दंड का भय न हो, तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता। सरकार जब खुद अपनी ही योजनाओं को लेकर गंभीर नहीं है, तो वह भास्कर ऐप के प्रति कितनी गंभीर होगी, यह समझा जा सकता है। शुरुआत में, जब तक इस योजना की नई-नए खुमारी रहेगी, कुछ छोटी-मोटी शिकायतों को ‘शोकेस’ करने के लिए तुरंत हल कर दिया जाएगा। अखबार के पहले पन्ने पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपेंगी—“भास्कर समाधान का असर: 24 घंटे में सुधरी नाली!” लेकिन जैसे ही यह नौटंकी पुरानी होगी, अधिकारी इस ऐप को भी उसी तरह ‘इग्नोर’ करना शुरू कर देंगे जैसे वे सीएम हेल्पलाइन को करते हैं। आखिरकार, बिल्ली कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, दूध देखकर उसका नीयत डोलना तय है।
खोजी पत्रकारिता की अर्थी और ‘शांति समझौते’ का अघोषित सच
अब आते हैं इस पूरे खेल के सबसे गहरे और स्याह पहलू पर, जिसे समझने के लिए किसी खोजी पत्रकार की नजर चाहिए। मध्य प्रदेश की राजनीति को जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि दैनिक भास्कर पिछले कुछ समय से मोहन यादव सरकार के लिए गले की हड्डी बना हुआ था। भास्कर ने प्रदेश में एक के बाद एक कई बड़े इन्वेस्टिगेटिव ऑपरेशन्स किए थे:
- ब्लड बैंक घोटाला (Blood Bank Ghotala): प्रदेश के सरकारी और निजी ब्लड बैंकों में चल रहे उस खूनी खेल का पर्दाफाश किया, जहाँ इंसानी खून का सौदा पानी की तरह किया जा रहा था।
- कोरेक्स सिरप की तस्करी: (Corex Syrup Taskari) रीवा और विंध्य क्षेत्र में किस तरह युवाओं की नसों में कोरेक्स का जहर घोला जा रहा है, और सबसे बड़ी बात—इस पूरे काले धंधे में खाकी वर्दी यानी पुलिस खुद किस तरह आकंठ डूबी हुई है, इसकी परत-दर-परत खबरें भास्कर ने छापी थीं।
जब कोई मीडिया हाउस इस तरह सरकार की नाक के नीचे चल रहे घोटालों को उजागर करता है, तो सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच जाता है। पुलिस कमिश्नर से लेकर मंत्रालय के बड़े-बड़े साहबों तक की नींद उड़ जाती है। ऐसे में राजा के पास दो ही रास्ते होते हैं—या तो वह उस मीडिया हाउस को डराए-धमकाए, या फिर दूसरा सबसे अचूक रास्ता अपनाए—“उसे अपना साझीदार बना लो।”
हालाँकि सरकार इसे एक सकारात्मक और जन-केंद्रित नवाचार (Citizen-centric Innovation) बता रही है, लेकिन राजनीति का पुराना नियम है—“यदि तुम अपने दुश्मन को हरा नहीं सकते, तो उसे अपना दोस्त बना लो।” भास्कर को ‘भास्कर समाधान’ का खिलौना थमाकर सरकार ने एक तीर से कई शिकार किए हैं। जब कोई मीडिया घराना सीधे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है, जब उसके ऐप पर सरकार के अधिकारी बैठकर काम करने लगते हैं, तो वह मीडिया हाउस अपनी ‘चौथी जागीर’ (Fourth Estate) वाली स्वतंत्र और आक्रामक भूमिका को खो देता है।
कल को अगर भास्कर के किसी रिपोर्टर को सरकार के खिलाफ कोई बहुत बड़ा घोटाला हाथ लगता है, तो वह उसे छापने से पहले सौ बार सोचेगा। संपादक जी कहेंगे—“अरे भाई, थोड़ा संभलकर! अभी मुख्यमंत्री जी के साथ मिलकर हमने ऐप लॉन्च किया है, हमारे अधिकारी दिन-रात उनके ऐप पर काम कर रहे हैं। अगर यह खबर छप गई, तो हमारा ‘समाधान’ खटाई में पड़ जाएगा।”
यह दरअसल खोजी पत्रकारिता की धार को कुंद करने का एक बेहद शातिर और कूटनीतिक ‘शांति समझौता’ (Peace Treaty) है। सरकार ने भास्कर को जनता की छोटी-मोटी समस्याओं (जैसे कचरा, पानी, बिजली) के निपटारे का ‘क्रेडिट’ दे दिया, और बदले में खुद के लिए एक ‘कवच’ तैयार कर लिया ताकि बड़े घोटालों पर कोई तीखे सवाल न उठाए जा सकें। अब भास्कर की भूमिका एक ‘चौकीदार’ की नहीं, बल्कि सरकार के ‘पीआर एजेंट’ जैसी होने की राह पर चल पड़ी है।
प्रजा का मनोरंजन, राजा का सुशासन
तो भाइयों और बहनों, इस ‘भास्कर समाधान’ के तमाशे को गौर से देखिए। यह आधुनिक भारत के डिजिटल सुशासन का वह चेहरा है, जहाँ सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़कर कॉरपोरेट के पाले में गेंद डाल देती है। जनता खुश है कि उसे ऐप पर फोटो खींचकर डालने का ‘पावर’ मिल गया है। भास्कर खुश है कि उसका यूजर बेस और रेवेन्यू बढ़ रहा है जिसे वे ‘सामाजिक सरोकार’ का नाम दे रहे हैं। सरकार खुश है कि अब अखबार में उसके खिलाफ तीखे खबरें छपना बंद हो जाएंगी।
सब खुश हैं, सिवाय उस लोकतंत्र के, जो कोने में बैठा अपनी किस्मत पर रो रहा है और सोच रहा है कि जिस प्रशासनिक व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह होना था, वह अब एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के ‘लाइक’, ‘शेयर’ और ‘कमेंट’ की मोहताज हो गई है। परसाई जी आज होते तो मुस्कुराते और कहते—“मूर्खों, खुश मत होओ! जब नाली साफ कराने के लिए भी तुम्हें किसी सेठ के ऐप पर अर्जी लगानी पड़े, तो समझ लेना कि सुशासन का तो पता नहीं, लेकिन तुम्हारी लाचारी का डिजिटल नवीनीकरण जरूर हो गया है।”
डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह राजनीतिक व्यंग्य शैली पर आधारित एक विश्लेषणात्मक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य किसी संस्थान की व्यावसायिक छवि को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक प्रणालियों में पारदर्शिता व सार्वजनिक जवाबदेही के मुद्दों को रेखांकित करना है।
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