सबसे पहले यह बताता हूँ कि यह लेख लिखनें की नौबत क्यों आई?
आज सुबह जब मैं अखबार और समाचार पोर्टल्स की सुर्खियों से गुज़र रहा था, तो मेरी नज़रें दो-तीन ख़बरों के बीच जाकर ठहर गईं और दिमाग़ सन्न रह गया।
पहली ख़बर मध्य प्रदेश के मोरैना ज़िले से थी—जहाँ एक ‘गृहलक्ष्मी’ ने अपने अवैध संबंधों के चक्कर में सुबह की पहली चाय में शक्कर के साथ ज़हर मिलाकर अपने पति को परलोक पहुँचा दिया। पन्ना पलटा तो उत्तर प्रदेश के मेरठ की दूसरी ख़बर सामने थी—जहाँ एक ब्यूटीशियन पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही सुहाग के दुपट्टे से पति का गला घोंट दिया, लाश को ज़मीन में गाड़कर ‘हार्ट अटैक’ का ड्रामा रचा और दस दिन बाद पुलिस ने कब्र खोदकर शव निकाला।
तभी मुझे कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की ही एक और भयावह वारदात याद आ गई—जहाँ रात की ड्यूटी से समय से दो घंटे पहले (सुबह 5 बजे के बजाय 3 बजे) घर लौटे पति को पत्नी ने रसोई में प्रेमी के साथ Sex करते रंगे हाथों पकड़े जाने पर मौत के घाट उतार दिया था। कत्ल के बाद उस महिला का निर्लज्ज बयान था—“अगर 3 बजे की जगह 5 बजे आता, तो बच जाता!”
सोनम रघुवंशी से लेकर सिया तक, और मोरैना-मेरठ से लेकर देश के अलग-अलग कोनों तक—कत्ल की ऐसी अंतहीन कहानियों का अंबार लगा हुआ है।
एक पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक के नाते मेरे मन में यह यक्ष प्रश्न कौंध गया कि आखिर इन मिलेनियल (Millennial) गृहिणियों को हो क्या गया है? जिन महिलाओं को घर बैठे हर सुख-सुविधा मिली है, जिनके पति दिन-रात मेहनत करके उनका हर नखरा उठा रहे हैं, वफ़ादार हैं—वे अचानक इतनी क्रूर और ज़हरीली कैसे होती जा रही हैं?
इनकी तुलना में तो आज की Gen Z लड़कियाँ कहीं ज़्यादा साफ़ और बेबाक हैं! वे कम से कम विवाह के झूठे पवित्र आडंबर में फँसने के बजाय खुलकर रिश्तों को नकारने का दम रखती हैं, जिससे पुरुषों को शादी से पहले ही उनके चरित्र और सोच का पता चल जाता है।
यही आत्मघाती सामाजिक विकृति मुझे इस विस्तृत, विश्लेषणात्मक और शोध-आधारित लेख को लिखने के लिए विवश कर गई। उद्देश्य केवल एक है—मिलेनियल पुरुषों और पतियों की आँखें खोलना, ताकि वे अपनी जान और स्वाभिमान बचा सकें; और सुखी गृहिणियों को उस ज़हरीली राह से मोड़ना जो उन्हें सीधे जेल की सलाखों और बदनामी के गटर तक ले जाती है।
तो शुरू करते हैं!
मोरैना व मेरठ का ‘चाय-कांड’, सुखी गृहिणियों का प्रहसन और पुरुष-मुर्गों की त्रासदी
हमारे देश में जब शादी होती है, तो होम-हवन के धुएँ में पंडित जी वेद-मंत्र बुदबुदाते हैं और दो प्राणियों को ‘सप्तपदी’ के फेरों में बाँध देते हैं। पुरुष उस समय यही समझता है कि उसे जीवन भर की संगिनी, सुख-दुख की साझीदार और घर की ‘गृहलक्ष्मी’ मिल गई है। पर हाल ही में मध्य प्रदेश के मोरैना और उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से आई खबरों ने इस वैदिक तिलस्म की पूरी पोल खोलकर रख दी।
खबरें बहुत सीधी, सरल और व्यावहारिक थीं। एक सज्जन दिन-रात मेहनत करके, जेठ की दोपहरी में हाड़ जलाकर, शहर के बाज़ार में पसीना बहाकर (चाहे वह राजमिस्त्री का काम हो या कोई व्यापार) रोज़ शाम को कमाई घर लाते थे। उद्देश्य केवल एक था—घर में पंखा-कूलर चलता रहे, ‘गृहलक्ष्मी’ के ब्यूटी पार्लर का बिल चुकता रहे, किटी पार्टी में उनका माथा ऊँचा रहे, और बच्चों की स्कूल फीस समय पर जमा हो जाए। लेकिन एक दिन उस लक्ष्मी ने अपने एक नवनिर्मित ‘सखा’ के अमूल्य परामर्श पर अमल करते हुए शक्कर के साथ थोड़ा-सा ज़हर मिला दिया, या फिर सुहाग के उसी दुपट्टे को फाँसी का फंदा बना दिया। पतिदेव सीधे परलोक सुधार गए और पीछे से ‘साइलेंट हार्ट अटैक’ का झूठा ड्रामा रचकर शव को दफना दिया गया—जिसे दस दिन बाद पुलिस को कब्र खोदकर (Exhume) निकालना पड़ा।
“भाइयों, भारत में पुरुष का असली भाग्य यह नहीं तय करता कि उसने सिविल सर्विसेज निकाली है या किसी मल्टीनेशनल में दस लाख का पैकेज पाया है। उसका असली भाग्य यह तय करता है कि उसकी सुबह की पहली चाय में शक्कर के अलावा कोई अतिरिक्त तत्व मिलाया गया है या नहीं। यदि आप सुबह उठकर चाय पी चुके हैं और दस मिनट बाद भी आपकी साँसें चल रही हैं, तो ईश्वर का धन्यवाद कीजिए और सीधे काम पर निकल जाइए; क्योंकि आपके घर की देवी अभी तक किसी नए प्रेमी के संपर्क में नहीं आई है।”
यह केवल मोरैना या मेरठ की एकल घटना नहीं है। फिरोजाबाद से लेकर पीलीभीत, मेरठ से लेकर सूरत और पटना तक—यह पूरे देश में फैल रहा एक नया ‘मिलेनियल फैशन’ है। आइए, इस पूरे परिहास, घर पर बैठकर मजे काटती सुखी गृहिणियों की मानसिक कंगाली, और गधे की तरह खटने वाले भारतीय पुरुषों की अंधी मुग़ालफ़लत का ज़रा बेबाक शल्य-चिकित्सा (Surgery) करें।
1. ‘गृहलक्ष्मी’ का मिथक और निठल्ली विलासिता का रसायन विज्ञान
हमारे समाज में ‘हाउसवाइफ’ या गृहिणी शब्द के आसपास एक बड़ा ही पवित्र, कारुणिक और आदरणीय आभामंडल रचा गया है। पुरानी फिल्मों और उपन्यासों ने हमें सिखाया कि गृहिणी वह देवी है जो सुबह चार बजे उठती है, चूल्हा फूँकती है, परिवार के स्वास्थ्य की चिंता करती है और त्याग की साक्षात मूर्ति है।
लेकिन आइए, आज की ‘आधुनिक मिलेनियल गृहिणी’ (Millennial Housewife) की दिनचर्या का ज़रा निष्पक्ष मुआयना करें:
- सुबह का अलार्म और नौकरों की फौज: सुबह आठ बजे जब पतिदेव दफ्तर या मजदूरी पर जाने के लिए तैयार हो रहे होते हैं, तब मैडम बिस्तर पर करवट बदल रही होती हैं। घर की झाड़ू-पोछे के लिए ‘बाई नम्बर 1’ तैनात है। बर्तन-चौका माँजने के लिए ‘बाई नम्बर 2’ मौजूद है। कपड़े धोने के लिए 9 किलोग्राम की फुल्ली-ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन है।
- दिन भर का डिजिटल उपवास: पतिदेव दफ्तर में साहब की गालियाँ सुन रहे हैं या धूप में पसीना बहा रहे हैं, और इधर घर पर मैडम के पास अनलिमिटेड WiFi और स्मार्टफोन है। दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक का समय रील (Reels) देखने, इंस्टाग्राम पर दूसरों के पतियों के सरप्राइज गिफ्ट्स देखकर अपने नसीब को कोसने, और व्हॉट्सएप ग्रुपों में गॉसिप करने में बीतता है।
- शाम का कायाकल्प: ब्यूटी स्टूडियो और जिम का बिल पतिदेव की जेब से ऑटो-डेबिट होता है। चेहरे पर तीन तरह के लेप लगाकर जब वे शाम को आईने के सामने खड़ी होती हैं, तो उन्हें अचानक लगता है कि वे तो साक्षात ‘हुस्न की परी’ हैं और उनका पति उनके सामने बिल्कुल ‘देहाती गधा’ या ‘थका हुआ मजदूर’ है।
यहाँ से उस भयानक ‘रसायन विज्ञान’ की शुरुआत होती है जिसे हम ‘खाली दिमाग, शैतान का घर’ कहते हैं।
जब इंसान के शरीर को कोई शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता, जब जीवन की बुनियादी ज़रूरतों—रोटी, कपड़ा, मकान और विलासिता—के लिए एक पैसा भी खुद नहीं कमाना पड़ता, तो दिमाग में काम का विचार नहीं, बल्कि ‘खुराफात’ जन्म लेती है। जब पसीना बहाना बंद हो जाता है, तो थके हुए पति की ईमानदारी और मेहनत ‘बोरिंग’ लगने लगती है, और सड़क पर घूमते हुए किसी बेरोजगार मजनू की छपरी पैंतरेबाज़ी ‘असीम प्रेम’ और ‘रोमांस’ प्रतीत होने लगती है।
ऐसी ‘हुस्न की परियों’ को यह गलतफहमी हो जाती है कि दुनिया में जो कुछ उन्हें मिला है—यह संगमरमर का फर्श, यह ब्रांडेड कपड़े, यह ब्यूटी पार्लर का निखार—यह सब केवल उनकी ‘खूबसूरती’ का स्वाभाविक पुरस्कार है!
वे यह भूल जाती हैं कि जिस 30-40 साल के पति की त्वचा समय से पहले ढल गई है, जिसके सिर के बाल काम के तनाव और ईएमआई (EMI) की चिंता में झड़ने लगे हैं, और जिसकी रीढ़ की हड्डी दिन-रात पसीना बहाते-बहाते झुक गई है—अगर उस पुरुष ने अपने शरीर का ईंधन नहीं जलाया होता, तो आज इन देवियों को सड़क पर कोई गोलगप्पा भी न खिलाता!
2. माता–पिता से अलगाव का षड्यंत्र और दोहरा चरित्र (Hypocrisy)
जब कोई महिला किसी घर में बहू बनकर आती है, तो सबसे पहला सांस्कृतिक संघर्ष इस बात का नहीं होता कि सब्जी में नमक कम है या ज़्यादा। सबसे पहला वार पुरुष के बूढ़े माँ-बाप और उसके अपने सगे भाइयों-बहनों पर होता है।
तथाकथित ‘सशक्त’ और विलासी महिलाएं सबसे पहला काम यह करती हैं कि पुरुष को उसके अतीत और उसके अपने खून के रिश्तों से काट दें। इसके पीछे बड़ा सीधा-सा आर्थिक और मनोवैज्ञानिक गणित होता है:
“जब तक घर में बूढ़े माँ-बाप रहेंगे, तब तक पति का ध्यान और उसकी कमाई का एक हिस्सा उनकी दवा-पानी और सेवा में जाएगा। जब तक सगे भाई-बहन रहेंगे, तब तक संपत्ति में बंटवारे की बात होगी। इसलिए पुरुष को पूरी तरह अकेला (Isolated) कर दो। उसे उसके अपने ही परिवार की नज़र में दोषी और गद्दार बना दो, ताकि वह पूरी तरह अपनी पत्नी का आर्थिक और मानसिक गुलाम बन जाए।”
जिस पुरुष को उसके अपने ही माँ-बाप से अलग कर दिया गया, जिसे यह समझा दिया गया कि उसके बूढ़े बाप की पेंशन और माँ की बीमारी घर पर बोझ है—उस पुरुष को रास्ते से हटाना फिर किसी चाय के कप में ज़हर मिलाने या रात के सन्नाटे में प्रेमी को बुलाकर गला घोंटने जितना आसान काम बन जाता है।
दोगलेपन (Hypocrisy) का नग्न प्रदर्शन
आइए, इस मानसिकता के उस भयावह दोगलेपन को देखें जिसे देखकर बड़े से बड़ा व्यंग्य भी शर्मिंदा हो जाए:
- सनातन धर्म की दुहाई और सास–ससुर से घृणा: जो औरत अपने पति के जन्मदाता माँ-बाप का सम्मान नहीं कर सकती, जो उनके बुढ़ापे की लाचारी और बीमारियों में पति का हाथ नहीं बँटा सकती, वही औरत घर में धार्मिक अनुष्ठान और व्रत सबसे ज़्यादा धूमधाम से मानती है! वह उस परंपरा का ढोंग करती है जिसके नाम पर भारतीय पुरुष अपनी पूरी जवानी और कमाई उसके कदमों में न्योछावर करता चला जाता है।
- पति के घर में ज़रा-सी अनबन हुई नहीं कि मैडम की ज़हरीली घोषणा आ जाती है—“अब मैं पूरी ज़िंदगी तुम्हारे घरवालों को नहीं देखूँगी!” पुरुष धर्म और शांति के नाम पर अपना सिर झुका लेता है, अपने ही माँ-बाप से छुप-छुपकर फोन पर बात करता है, जैसे वह कोई अंतर्राष्ट्रीय अपराधी हो।
- लेकिन यही कड़ा कानून मायके वालों पर कभी लागू नहीं होता!
- मायके का भाई चाहे कितना भी बड़ा निक्कमा हो, शराबी हो, जुआरी हो या अपने ही माँ-बाप को गालियाँ देता हो, ऐयास हो, वह मैडम के लिए हमेशा ‘अभिमन्यु’ और ‘राम’ ही रहेगा। उसकी आर्थिक मदद के लिए पति की जेब पर डाका डाला जाएगा।
- मायके की बहन चाहे कितनी भी विषैली और घर-फूँक तमाशा देखने वाली हो, उसके साथ फोन पर दिन में 5-5 घंटे बिना किसी बात के ठहाके लगाए जाएँगे। उसके बच्चों पर दिन-रात ‘बाबू-सोना’ लुटाया जाएगा, उनके लिए महंगे खिलौने खरीदे जाएँगे। लेकिन वहीं खुद की भाभी चाहे जितना सास-ससुर की सेवा करे, उसमें हजार नुक्स निकाले जाएंगे। छोटी सी गलती और मैडम का फरमान, अब मैं भाभी से जिंदगी भर बात नहीं करूंगी।
- लेकिन जब पति के घर में उसके अपने भाई-बहन के यहाँ कोई नया नवजात शिशु जन्म लेता है, तो इन देवियों को उस मासूम का मुँह देखना भी गवारा नहीं होता! वे मुँह बनाकर बैठ जाती हैं कि “इन लोगों ने हमारा जीना हराम कर रखा है, बहुत दोगले किस्म के लोग हैं।”
क्या यह शुद्ध मानसिक कंगाली और पारिवारिक डकैती नहीं है? पुरुष बेचारा ‘पतिधर्म’ के नाम पर यह सब सहता जाता है और समझता है कि वह अपने घर में शांति बना रहा है। उसे यह समझ नहीं आता कि वह शांति नहीं बना रहा, बल्कि अपनी ही कब्र की खुदाई का ठेका अपनी पत्नी को दे रहा है।
3. मिलेनियल पुरुषों की त्रासदी: मुर्गा कट गया, पर खाने वाले को मज़ा नहीं आया!
हमारा यह मिलेनियल (Millennial) पुरुषों का वर्ग इतिहास का सबसे बदनसीब वर्ग साबित हुआ है। यह वह पीढ़ी है जिसने अपने बाप-दादाओं को घर का हुक्मरान और मालिक बनते देखा था, और जब खुद पति बनने की बारी आई, तो घर का ‘बंधुआ मजदूर’ और ‘नौकर’ बनकर रह गया।
इस पीढ़ी के पुरुषों ने क्या-क्या पाप नहीं किए:
- उन्होंने अपने माँ-बाप से लड़ा, उनके दिल तोड़े ताकि अपनी पत्नी को अलग मकान दिला सकें।
- उन्होंने हफ्ते के सातों दिन 14-14 घंटे काम किया ताकि मैडम को स्मार्टफोन, ब्यूटी पार्लर के खर्चे, ब्रांडेड बैग और साल में दो बार हिल स्टेशन का ट्रिप दे सकें।
- उन्होंने अपनी हर व्यक्तिगत खुशी, अपने दोस्तों, अपने शौक और अपने आराम को चूल्हे में झोंक दिया।
और 40-45 साल की उम्र में जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो उन्हें क्या मिला?
शारीरिक और मानसिक पतन: 40-45 की उम्र में रीढ़ की हड्डी झुक चुकी है, घुटने जवाब दे रहे हैं, सिर के बाल उड़ चुके हैं, और शरीर में बीपी, शुगर व कोलेस्ट्रॉल की गोलियों का डिब्बा टेबल पर रखा है।
- शून्य सम्मान: जिस पत्नी के लिए उन्होंने पूरी ज़िंदगी का ईंधन जला दिया, वही पत्नी अपने नए 24-25 साल के प्रेमी के साथ बैठकर हँस रही है और कह रही है—“इस बुड्ढे ने मेरी ज़िंदगी खराब कर दी! इसने मुझे कभी वह प्यार और थ्रिल नहीं दिया जो मुझे चाहिए था।”
यह तो वही बात हो गई कि “मुर्गा भी कट गया, उसकी पूरी बोटी-बोटी बिक गई, लेकिन खाने वाले ने थूकते हुए कहा कि मांस में नमक कम था और मज़ा नहीं आया!”
इतिहास में सबसे ज़्यादा सुख-सुविधाएँ, अधिकार और आराम पाने वाली यह ‘थैंकलेस’ (Thankless) मिलेनियल गृहिणी वर्ग दिन-रात केवल अपनी उपेक्षा का रोना रोती रही। उसने कभी यह पलटकर नहीं देखा कि उस थके हुए पुरुष की जेब में कितने छाले पड़े हैं।
4. ‘एक चाय, दो समोसा’ का नारा और Gen Z का नया सवेरा
आजकल की युवा पीढ़ी (Gen Z) की लड़कियाँ जब सड़कों पर निकलती हैं या सोशल मीडिया पर रील बनाती हैं, और बड़े ही गर्व से चिल्लाती हैं—
“एक चाय, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा!”
वे इस नारे को महिला सशक्तीकरण की सबसे ऊँची मिसाल समझती हैं। लेकिन मैं इस नारे का स्वागत करता हूँ! यह बहुत ही अद्भुत और शुभ संकेत है।
कम से कम इस नारे के बहाने इन आधुनिक देवियों का ‘असली चेहरा’ और उनकी ‘आंतरिक सोच’ आज के 20-22 साल के युवाओं के सामने नंगी होकर आ गई है। आज का Gen Z लड़का मिलेनियल पुरुषों जितना बेवकूफ और भावुक नहीं है। वह देख रहा है कि उसके पिता ने अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी माँ और पत्नी के बीच पिसकर कैसे बर्बाद की। वह देख रहा है कि उसके बड़े भाई की आधी कमाई कोर्ट-कचहरी और एलिमनी (Alimony) के मुकदमों में स्वाहा हो रही है।
Gen Z का लड़का अब यह गलती दोबारा नहीं दोहराएगा:
- वह ‘परिवार बसाने’ के नाम पर खुद को बलि का बकरा नहीं बनाएगा।
- वह समझ चुका है कि जब भरोसा समोसे और चाय के भाव पर ही बिकना है, तो फिर शादी नाम के इस घाटे के सौदे में अपनी गर्दन क्यों फँसाना?
- वह अब ‘प्रदाता’ (Provider) बनने की अंधी दौड़ से बाहर निकल रहा है। वह अपनी कमाई अपने माँ-बाप पर, अपने शौक पर, अपनी सेहत पर और अपने भविष्य पर खर्च करेगा।
मिलेनियल पुरुषों ने जो गलती की—ना घर बचा पाए, ना खुद को बचा पाए—वह सबक आज की नई पीढ़ी के लिए एक कड़वी लेकिन जीवनरक्षक दवा बन चुका है।
5. ‘30 मिनट का फ़िल्मी प्यार’ बनाम ‘14 घंटे की हाड़–तोड़ मजदूरी’
घर पर बैठकर आराम फरमा रही महिलाओं की सबसे बड़ी और स्थायी शिकायत यह होती है:
“यह इंसान दफ्तर या काम से आता है, थका हुआ मुँह बनाकर खाना खाता है और सो जाता है। न मुझसे दो घंटे बैठकर रोमांटिक बातें करता है, न मुझे चूमता है, न मुझे सरप्राइज गिफ्ट देता है, न मेरी तारीफ में गज़ल गाता है। हमारी शादी में अब वह ‘स्पार्क’ (Spark) नहीं रहा!”
अरी ओ मुग़ालते की मारी, फ़िल्मी दुनिया में जीने वाली देवियों!
जो पुरुष सुबह आठ बजे से रात नौ बजे तक बाज़ार की भट्टी में खुद को तपाकर लौटता है, जो दिन भर अपने बॉस की डांट, ग्राहकों की बदतमीज़ी, ट्रैफिक का धुआँ, और बैंक के कर्ज़ की किश्तों का दबाव अपने दिमाग में ढोकर आता है—वह घर में ‘रोमांस का नाटक’ करने नहीं आता! वह घर में केवल थोड़ी-सी शांति, दो रोटी और दो घंटे की सुकून की नींद की तलाश में आता है। तुम लाश बनकर लेट जाओ और वो रोमांस करे? बल्कि होना उल्टा चाहिए था। जो रोमांस तुम घंटों रील मे देख कर expect कर रही हो तुम खुद क्यों नहीं अपने थके हुए पती को तरोताजा करनें में आजमाती? नहीं करोगी क्योंकि तुम्हें खुश करनें का ठेका सिर्फ पति नें ले रखा है, तुम्हें सिर्फ चाहिए, देना कुछ नहीं है।
उसके शरीर का पूरा ग्लूकोज और मानसिक ऊर्जा बाज़ार ने चूस ली है। उसके पास इतनी ताकत ही नहीं बचती कि वह किसी शाहरूख खान की तरह बाहें फैलाकर आपके सामने दो घंटे तक संवाद बोले या झूठी ड्रामेबाज़ी करे।
और जिस ‘नए मजनू’ के पीछे तुम अपना घर, अपना सुहाग और अपना चरित्र स्वाहा करने पर तुली हो, उस मजनू का गणित भी ज़रा समझ लो:
- निठल्लापन ही रोमांस का ईंधन है: उस मजनू के पास दिन में तीन घंटे आपसे फोन पर बात करने और रोमांटिक शायरी सुनाने का समय इसलिए है, क्योंकि वह आपकी तरह ही निठल्ला, आवारा और कामचोर है! उसके पास न कोई जिम्मेदारी है, न कोई भविष्य।
- मुफ्त की रोटी का मज़ा: वह मजनू आपकी खूबसूरत शक्ल पर नहीं मरा है। वह आपके पति के पैसे से मिले एसी कमरे, आपके पति के क्रेडिट कार्ड से खरीदे गए कपड़ों और आपके खाली समय का मुफ्त में मज़ा ले रहा है।
- समय का क्रूर चक्र: जिस दिन उस मजनू पर अपने खुद के परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी आएगी, जिस दिन उसे भी ईएमआई भरने के लिए बाज़ार में धक्के खाने पड़ेंगे—वह भी 40 की उम्र में आपके पति से भी ज़्यादा थका हुआ, चिड़चिड़ा और गंजा दिखाई देने लगेगा!
तब आप किस नए मजनू की तलाश में निकलेंगी?
6. पुरुषों के लिए आत्म–परीक्षण: विश्राम करें, आत्म–विश्लेषण करें और भ्रम से बाहर आएँ
भारतीय पुरुष की सबसे बड़ी दुखद बीमारी यह है कि वह ‘प्रदाता’ (Provider) और ‘रक्षक’ की महानता का मुकुट पहनकर आत्ममुग्ध होता रहता है। वह सोचता है कि अगर वह अपनी जान जलाकर घर में पैसा लाता रहेगा, तो पूरा पत्नी उसके कदमों में एक न एक दिन झुकेगी ही, और उससे असीम प्रेम करनें लगेगी।
यह पुरुषों का सबसे बड़ा ऐतिहासिक भ्रम है!
पुरुषों को अब रुककर, एक लंबी साँस लेकर, अपनी आँखों पर चढ़ा हुआ ‘पतिव्रता धर्म’ का धुंधला चश्मा उतारने की सख्त ज़रूरत है:
- जो आज सम्मान नहीं करती, वह कल कभी नहीं करेगी: अगर आपकी पत्नी आपकी दिन-रात की मेहनत, आपकी थकान, आपके खून-पसीने और आपके त्याग की कद्र आज नहीं कर रही है—अगर वह आज आपके बूढ़े माँ-बाप के लिए एक कप चाय बनाते समय मुँह बनाती है—तो यह गलतफहमी दिल से निकाल दीजिए कि भविष्य में जब आप बीमार या बूढ़े होंगे, तो वह आपकी सेवा करेगी। पैसा कमाने वाली मशीन बने रहने से कभी सच्चा सम्मान नहीं मिलता। जिस दिन मशीन की ग्रीसिंग (कमाई) बंद होगी, उस दिन मशीन को कबाड़ में फेंक दिया जाएगा।
- सच्चा समर्पण आज है या कभी नहीं: यदि आपके हिस्से में आज केवल शिकायतें, नखरे, दूसरों के पतियों से तुलना और उपेक्षा आ रही है, तो याद रखिए कि आपका भविष्य अंधकारमय है। जब तक आपकी जेब भरी है, तब तक आपका स्वागत है; जिस दिन जेब खाली हुई या आपका स्वास्थ्य गिरा, उस दिन आपको अपने ही घर में एक फालतू सामान की तरह किनारे कर दिया जाएगा।
- अपने माँ–बाप और बहनों से रिश्ते बहाल करें: किसी एक इंसान (पत्नी) को खुश करने के लिए अपने जन्मदाता माँ-बाप और सगे भाई-बहनों को छोड़ देना पुरुष की सबसे बड़ी नपुंसकता और मूर्खता है। जिस क्षण आप अपने खून के रिश्तों को काटते हैं, उसी क्षण आप पूरी तरह अकेले पड़ जाते हैं। और जैसा कि मैंने पहले कहा—अकेले पड़े हुए पुरुष को निपटाना फिर किसी चाय के कप या दुपट्टे का खेल बनकर रह जाता है। अपने माँ-बाप के पास बैठिए, उनके पैर दबाइए, उनसे माफी माँगिए और अपने पारिवारिक तंत्र को दोबारा मजबूत कीजिए।
7. ‘सशक्तीकरण’ का ढोंग, संपत्ति की डकैती और कत्ल का गणित
आजकल हमारे समाज और अदालतों में ‘वूमेन एम्पावरमेंट’ (महिला सशक्तिकरण) का बड़ा ढोल पीटा जाता है। कानून इस तरह बनाए गए हैं जैसे इस देश में हर पुरुष जन्मजात अत्याचारी है और हर महिला साक्षात सीता की अवतार है।
अधिकार सबको चाहिए, बराबरी का ढोंग सबको करना है, लेकिन जब ज़िम्मेदारी, श्रम और त्याग की बात आती है—तो अचानक वे ‘अबला नारी’ बन जाती हैं!
यहाँ एक बहुत बड़ा व्यावहारिक सवाल खड़ा होता है:
“अगर किसी महिला को अपने पति से कोई शिकायत है, अगर उसे पति बोरिंग लगता है, अगर उसे कोई दूसरा पुरुष पसंद आ गया है—तो कानून उसे सम्मानजनक अलगाव (Divorce) का पूरा अधिकार देता है। वह अलग हो जाए और अपनी ज़िंदगी अपने नए प्रेमी के साथ जिए। फिर वह अपने ही पति की चाय में ज़हर क्यों मिलाती है या रात में प्रेमी को बुलाकर उसका कत्ल क्यों करवाती है?”
आइए, इस ‘व्यापारिक हत्या’ (Commercial Murder) के गणित को ज़रा ठीक से समझें:
- तलाक का घाटा: अगर मैडम पति से तलाक लेती हैं, तो कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगेगा। पति की संपत्ति का केवल एक हिस्सा या मेंटेनेंस (Alimony) ही मिलेगा। उसमें भी मायके वालों और समाज की थू-थू सहनी पड़ेगी।
- कत्लकामुनाफा: लेकिन अगर पति की ‘अचानक हार्ट अटैक’ या ‘दुर्घटना’ से मौत की कहानी गढ़ दी जाए—तो क्या-क्या हाथ आता है?
- पति का मकान और ज़मीन पूरी तरह मैडम के नाम।
- पति की बैंक एफडी, म्यूचुअल फंड और सेविंग्स पर एकछत्र अधिकार।
- जीवन बीमा कंपनी (LIC) से मिलने वाला लाखों-करोड़ों का क्लेम।
- और सबसे बड़ी बात—यदि समाज और परिवार चुप्पी साध ले, तो बिना किसी डिवोर्स के पूरे साम्राज्य पर कब्ज़ा और नए प्रेमी के साथ बिना किसी कानूनी बाधा के अय्याशी!
इसे कहते हैं शुद्ध ‘कॉरपोरेट डकैती’! यह प्यार, असंतोष या रोमांस का मामला नहीं है। यह तो एक परजीवी (Parasite) द्वारा अपने ही मेजबान (Host) को मारकर उसका पूरा खून चूस लेने और उसकी लाश पर बैठकर नए प्रेमी के साथ अय्याशी करने का आधुनिक आपराधिक मॉडल है।
8. हितधारकों (Stakeholders) के लिए अनुत्तरित प्रश्न
यह लेख केवल एक आक्रोश नहीं है। यह हमारे समाज के तमाम कर्णधारों, कानूनविदों, विचारकों और नीति-निर्माताओं के मुँह पर तमाचा मारते हुए कुछ कड़वे सवाल छोड़ता है। इन सवालों के जवाब जब तक हम नहीं ढूँढेंगे, तब तक मोरैना और मेरठ के ये ‘कांड’ हर शहर में दोहराए जाते रहेंगे।
1. न्यायपालिका और कानून–निर्माताओं से सवाल:
- क्या हमारे देश के कानून केवल पुरुषों को दंडित करने और महिलाओं को पीड़ित मानने की एकतरफा धारणा पर ही चलते रहेंगे?
- जब कोई महिला व्यभिचार (Adultery) करती है और अपने पति की संपत्ति हड़पने के लिए षड्यंत्र रचती है, तो पुरुष के लिए त्वरित न्याय की क्या व्यवस्था है?
- क्या अदालतों को मेंटेनेंस और एलिमनी तय करते समय इस बात की जाँच नहीं करनी चाहिए कि पत्नी घर में रहकर पति के बूढ़े माँ-बाप का सम्मान कर रही है या उन्हें प्रताड़ित कर रही है?
2. समाज और माता–पिता से सवाल:
- अपनी बेटियों को ‘पापा की परी’ बनाकर पालने वाले माता-पिता उन्हें यह क्यों नहीं सिखाते कि शादी केवल अधिकार छीनने का नाम नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी निभाने का नाम है?
- बेटियों को ब्यूटी पार्लर, किटी पार्टी और रील्स बनाने की छूट देने वाले परिवार उन्हें यह क्यों नहीं सिखाते कि पति के माँ-बाप भी उतने ही आदरणीय हैं जितने उनके अपने माँ-बाप?
3. मिलेनियल और Gen Z महिलाओं से सवाल:
- जो महिला खुद एक रुपया नहीं कमाती, जो घर के सारे कामों के लिए नौकर रखती है—उसे किस बात का इतना अहंकार और ‘चरबी’ चढ़ जाती है कि वह अपने दाता (Provider) को ही तुच्छ समझने लगती है?
- क्या कभी आपने अकेले में शीशे के सामने खड़े होकर सोचा है कि अगर आपका पति कल काम पर जाना बंद कर दे, तो आपकी इस ‘खूबसूरत शक्ल’ और ‘नखरों’ की बाज़ार में क्या कीमत बचेगी?
9. सुबह की चाय और जागता हुआ स्वाभिमान
अंतिम बात यही है कि पुरुषों को अब अपनी अंधी मुग़ालफ़लत और ‘महान प्रदाता’ बनने के नाटक से बाहर आना होगा।
अगर आप रोज़ सुबह उठकर दिन-रात गधे की तरह खट रहे हैं, अपने शरीर को जला रहे हैं, अपने बूढ़े माँ-बाप की उपेक्षा करके केवल अपनी पत्नी के नखरे उठा रहे हैं—और बदले में आपको केवल यह सुनने को मिल रहा है कि “आपने मेरे लिए किया ही क्या है?”—तो समझ जाइए कि खतरा आपके बेडरूम तक पहुँच चुका है। मोरैना और मेरठ अब दूर नहीं हैं।
पुरुषों के लिए कुछ कड़वे जीवन–मंत्र:
- काम से थोड़ा विश्राम लीजिए: अपनी सेहत, अपनी मानसिक शांति और अपने स्वाभिमान को प्राथमिकता दीजिए। पैसा कमाने की ऐसी अंधी दौड़ में मत भागिए जहाँ आप खुद ही खत्म हो जाएँ।
- अपने माँ–बाप का हाथ मत छोड़िए: दुनिया की कोई भी पत्नी आपके माँ-बाप का विकल्प नहीं हो सकती। जो औरत आपके माँ-बाप को इज़्ज़त नहीं दे सकती, उसे अपने जीवन में हद से ज़्यादा तरजीह देना बंद कीजिए।
- अपनी आँखों से पर्दा हटाइए: ‘अंधे समर्पण’ के बजाय ‘व्यावहारिक सच्चाई’ को पहचानिए। अगर पत्नी के आचरण में ज़हर, षड्यंत्र और मायके का अंधा पाखंड दिखाई दे, तो समय रहते कड़े कदम उठाइए।
और घर पर बैठकर विलासिता का आनंद ले रही देवियों को भी यह अंतिम चेतावनी समझ लेनी चाहिए:
“आपकी सुंदरता, आपका निखार, आपकी किटी पार्टी का रुतबा और आपका यह सारा अहंकार—आपके पति की जेब और उसकी रीढ़ की हड्डी के दम पर टिका हुआ है। जिस दिन वह मेहनत की नींव हटेगी, जिस दिन वह थका हुआ पुरुष अपना हाथ खींच लेगा या दुनिया से चला जाएगा—उस दिन कोई सड़क छाप मजनू आपको एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछेगा। जेल की ठंडी दाल, पुलिस की तफ़तीश और 10 दिन बाद कब्र से निकलते सच के सामने सारा ‘फ़िल्मी रोमांस’ दो दिन में विसर्जित हो जाता है।”
इसलिए, अगली बार जब आपके घर में सुबह की चाय बने—तो पुरुष ज़रा संभलकर कप उठाए, और पत्नी ज़रा संभलकर कप पकड़ाए। क्योंकि चाय में अगर मिठास आपसी सम्मान और ईमानदारी की नहीं है, तो समझ लीजिए कि उस घर की नींव में ज़हर घुल चुका है!
Written by: Journalist Vijay Mishra



