Written by: Journalist Vijay Mishra
कल ही की बात है, दुनिया के इस कोने से उस कोने तक भू-राजनीति (Geopolitics) के बड़े-बड़े फव्वारे छूट रहे थे। हर कोई यह साबित करने में जुटा था कि वह इतिहास का अगला सिकंदर है। लेकिन हमारे देश के सीधे-साधे, भलमनसाहत से भरे लोग सुबह की चाय की चुस्की के साथ अखबार के पन्ने पलट रहे थे और सोच रहे थे कि आज मौसम सुहाना रहेगा या नहीं। उन्हें क्या पता कि पर्दे के पीछे दुनिया की महाशक्तियां आपस में कुरुक्षेत्र सजाए बैठी थीं। यह वाकया इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो या न हो, पर व्यंग्य के इतिहास में इसे ‘तेल मालिश और महाशक्तिशाली नौटंकी’ के अध्याय के रूप में जरूर पढ़ाया जाएगा।
कथा कुछ यूं है कि दुनिया के वे महानायक, जो हर देश को सुबह-शाम लोकतंत्र का प्रमाणपत्र बांटते फिरते हैं, अचानक Venezuelan (वेनेजुएला के) कच्चे तेल के लिए एक अदद रिफाइनरी की तलाश में मारे-मारे फिर रहे थे। अब महाशक्ति ठहरे, तो उन्हें ऐसी रिफाइनरी चाहिए थी जो सस्ती भी हो, भौगोलिक रूप से सुरक्षित भी हो और जिसके पास कूटनीतिक रूप से ‘जुगाड़’ का पक्का लाइसेंस भी हो। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनकी निगाहें सीधे भारत पर आकर टिकीं। भारत क्या है? भारत तो जैसे दुनिया भर के कच्चे तेल के लिए ‘धोबी घाट’ बन चुका है, जहां दाग अच्छे हों या बुरे, सब साफ कर दिए जाते हैं।
महाशक्ति की मजबूरी और हमारी ‘कठपुतली’ वाली पटकथा
अब दिक्कत यह थी कि अगर उन्होंने भारत से तेल रिफाइनरी का सौदा कर लिया, तो कल को भारत उनकी तेल निर्यातों पर नकेल कस सकता था और दुनिया के सामने आंखें भी दिखा सकता था। महाशक्ति ने सोचा—”अरे राम-राम! ये भारतीय रिफाइनरी वाले तो कल को हमें आंख दिखाएंगे। इनका इलाज एक ही है—एक अदद ‘कठपुतली सरकार’ (Puppet Government) बिठा दी जाए, ताकि बिना किसी झंझट के तेल साफ कराया जा सके!”
बस फिर क्या था! योजना बनी। योजना ऐसी थी कि चाणक्य भी शरमा जाएं। Meta और X (ट्विटर) जैसे आधुनिक डिजिटल अस्त्रों को युद्ध के मैदान में उतार दिया गया। भारतीय दक्षिणपंथी (Right-wing) पोस्टों को ऐसे दबाया गया जैसे गर्मियों में बिजली जाने पर कूलर का स्विच ऑफ कर दिया जाता है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और पूरा वामपंथी कुनबा एक मंच पर प्रकट हो गया और सबने मिलकर ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) का शंखनाद कर दिया। ऐसा लगा कि मानों पूरा देश कल सुबह ही तख्तापलट के जश्न में डूब जाएगा।
लेकिन वे यह भूल गए कि भारत की जनता भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली है। यहाँ लोग चुनाव के समय ईवीएम की मशीन दबाते वक्त अपना ही हिसाब लगाते हैं। सारे धरने-प्रदर्शन फुस्स हो गए, जैसे दीवाली का कोई घटिया पटाखा हो। जनता ने देखा कि लाख माथापच्ची कर लो, अंत में नरेंद्र मोदी के अलावा कोई दूसरा विकल्प प्रधानमंत्री की कुर्सी पर फबता ही नहीं है। जनता ने कहा—भाई, ड्रामा जितना मर्जी कर लो, राशन और सुरक्षा का हिसाब तो यही आदमी देखता है!
अंतरराष्ट्रीय रंगमंच के पर्दे के पीछे: महाशक्तियों का कूटनीतिक ‘नौटंकी’ नाटक
आइए, इस पूरी घटना को थोड़ा और गहराई से टटोलें। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी घटना इत्तेफाक से नहीं होती। जब अमेरिका को वेनेजुएला के तेल के लिए ठिकाना चाहिए था, तो उसने सबसे पहले अपने पुराने बही-खाते खोले। दुनिया जानती है कि अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते वैसे ही हैं जैसे सांड और लाल कपड़ा। लेकिन तेल की प्यास ऐसी चीज है जो आदमी को किसी से भी निकाह करने को मजबूर कर देती है।
अब अमेरिका के सामने संकट यह था कि वेनेजुएला का भारी-भरकम कच्चा तेल रिफाइन कहां हो? यूरोप के अपने नखरे हैं, वे खुद ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। चीन के साथ अमेरिका की आँख-मिचौली चल रही है, और चीन को तेल देने का मतलब है ड्रैगन को और अधिक मजबूत करना। ऐसे में एकमात्र सुरक्षित, तकनीकी रूप से दक्ष और भौगोलिक रूप से भारत महासागर के रास्ते अच्छी तरह कनेक्टेड देश सिर्फ भारत ही नजर आया।
लेकिन महाशक्ति का अहंकार बीच में आड़े आ रहा था। अमेरिका की आदत है कि वह जिस देश से भी व्यापार करे, उस पर अपनी लाठी घुमाता रहे। उसे लगा कि यदि भारत जैसे विशाल देश की रिफाइनरियों पर उसका नियंत्रण नहीं हुआ, तो आने वाले समय में भारत ओपेक (OPEC) या अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ मिलकर उसकी हेकड़ी निकाल सकता है। इसलिए, अमेरिका के रणनीतिकारों ने ‘क्लासिक सीआईए स्टाइल’ गेमप्लान तैयार किया—जिसे हम कूटनीति की भाषा में ‘शासन परिवर्तन’ (Regime Change) कहते हैं।
डिजिटल युग के नए प्यादे: Meta, X और प्रायोजित क्रूरता
पुराने जमाने में तख्तापलट के लिए सेना के टैंक सड़कों पर उतरते थे। आज के आधुनिक डिजिटल युग में टैंकों की जगह एल्गोरिदम और सोशल मीडिया पोस्ट ले चुके हैं। अमेरिका के थिंक टैंकों ने सोचा कि भारत में एक ऐसा माहौल बनाया जाए जहां सरकार अस्थिर लगे। इसके लिए देश के भीतर के राजनीतिक दलों, एनजीओ (NGOs) और कथित बुद्धिजीवियों को एक सूत्र में पिरोया गया।
फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अचानक से एक ही किस्म के नैरेटिव ट्रेंड करने लगे। भारत के दक्षिणपंथी विचारकों और राष्ट्रवादी आवाजों के अकाउंट्स को ‘शैडोबैन’ किया जाने लगा या उनकी पहुंच को कृत्रिम रूप से सीमित कर दिया गया। इसके विपरीत, सरकार विरोधी ताकतों को ग्लोबल बूस्ट मिला। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और वामदलों के नेताओं के बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर ऐसे पेश किया गया जैसे पूरा देश सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आया हो।
विदेशी मीडिया घरानों—जैसे न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी—ने मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसमें यह साबित करने की कोशिश की गई कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और यहां का नेतृत्व पूरी तरह से विफल हो चुका है। मकसद साफ था—भारत की जनता के मन में यह शंका पैदा करना कि यदि मोदी सरकार सत्ता में रही, तो देश का आर्थिक भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
जब जनता ने कहा—“रहने दो भाई, हमें ड्रामा नहीं विकास चाहिए“
लेकिन विदेशी आकाओं और उनके स्थानीय एजेंटों की यह भूल थी कि वे भारत की मिट्टी की नब्ज़ नहीं पहचानते थे। भारत का आम नागरिक, जो रिक्शा चलाता है, खेत में पसीना बहाता है या छोटी सी दुकान चलाता है, वह इन विदेशी साजिशों की भाषा नहीं समझता, लेकिन वह अपनी सुरक्षा और देश की स्थिरता को भली-भांति समझता है।
जब तथाकथित ‘क्रांतिकारी’ और धरनेबाज जंतर-मंतर या अन्य चौराहों पर तंबू गाड़कर बैठे, तो जनता ने उन्हें चाय की दुकान पर बैठे किसी जोकर की तरह देखा। लोगों ने कहा—”भैया, ठंड हो या गर्मी, राशन समय पर मिल रहा है, देश की सीमाएं सुरक्षित हैं और दुनिया में डंका बज रहा है। हमें इन विदेशी इशारों पर नाचने वाले नेताओं से कोई लेना-देना नहीं है।”
सारे धरने-प्रदर्शन फुस्स हो गए। विदेशी मीडिया की हेडलाइंस धरी की धरी रह गई। जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का विकल्प फिलहाल किसी के पास नहीं है। जनता जानती है कि राजनीतिक दल विरोध कर सकते हैं, लेकिन देश को संभालना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंख में आंख डालकर बात करना हर किसी के बस की बात नहीं है।
और अंत में… ‘डील’ पक्की हो गई!
जब अमेरिका के रणनीतिकारों ने देखा कि यहाँ जनता को फुसलाना लोहे के चने चबाने जैसा है, और तख्तापलट के चक्कर में पड़े तो वे खुद ही अपनी राजनीति में उलझ जाएंगे, तो उन्होंने बिना वक्त गंवाए अपनी अकड़ अपनी जेब में रख ली। कूटनीति में भावनाएं नहीं होतीं, सिर्फ और सिर्फ ‘राष्ट्रीय हित’ और ‘मुनाफा’ होता है।
अमेरिका ने देखा कि भारत को झुकाने का सपना अधूरा ही रहेगा, तो क्यों न भारत के साथ एक महा-सौदा कर लिया जाए? बिना एक पल गंवाए, अमेरिका ने भारत सरकार के सामने सीधे-साधे शब्दों में एक शानदार ‘डील’ रख दी।
और कमाल देखिए! जैसे ही प्रस्ताव मेज पर आया, सारे धरने, प्रदर्शन और क्रांति वाले नारे एक झटके में ऐसे शांत हो गए जैसे ब्याह के बाद डीजे बंद होने पर सन्नाटा छा जाता है। कल तक जो नेता देश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को लेकर छाती पीट रहे थे, वे अचानक ऐसे शांत हो गए मानो उन्हें सांप सूंघ गया हो।
टैरिफ की विदाई और रूस के तेल का ‘हरा झंडा’
इस सौदे के तहत अमेरिका ने भारत पर लगाए गए अधिकांश व्यापारिक टैरिफ (आयात शुल्क) हटा लिए। और तो और, जो अमेरिका कल तक भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने पर आँखें दिखाता था, धमकी देता था और प्रतिबंधों की गीदड़भभकी देता था, उसी अमेरिका ने भारत को आधिकारिक रूप से रूस से खुलकर तेल खरीदने का ‘हरा झंडा’ (Green Signal) थमा दिया।
वाह रे कूटनीति! कल तक जो पाप था, वह आज पुण्य बन गया। कल तक रूस का तेल खरीदना अमेरिका की नजर में लोकतंत्र की हत्या था, और आज वही तेल भारत के रास्ते रिफाइन होकर अमेरिकी बाजार में पहुंचने की राह देख रहा है तो वह ‘वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा’ बन गया। इसे कहते हैं समय का पहिया और कूटनीतिक चतुरता!
अब भारत के हाथ में महाशक्ति की गर्दन
परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब यदि यह सौदा कागजों से निकलकर जमीन पर पूरी तरह फाइनल हो जाता है, तो इतिहास में यह पहला मौका होगा जब भारत के हाथ में उस महाशक्ति की गर्दन होगी जो कल तक दुनिया को नचाती थी।
भारत के पास अब रूस का सस्ता कच्चा तेल भी है, अमेरिकी बाजार तक सीधी पहुंच भी है, और अपनी घरेलू रिफाइनिंग क्षमता का ऐसा बेजोड़ नेटवर्क है जो दुनिया के किसी अन्य देश के पास नहीं है। यह भारत के लिए एक स्वर्णिम अवसर है कि वह इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का फायदा उठाकर अपनी अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर एक नई उड़ान दे।
यह इस दशक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत है। तेल रूस का, रिफाइनरी भारत की, खरीद-फरोख्त अमेरिका के आशीर्वाद से, और वाहवाही पूरी दुनिया में हमारे कूटनीतिक कौशल की!



