मध्यप्रदेश में निठल्लों की राष्ट्रीय पाठशाला, रीवा का ‘22.3%’ और साहिबों का विकास का ढोल | Journalist Vijay | MP News

Published:

सरकारी कागजों की अपनी एक खास गंध होती है। उसमें चूने की बदबू होती है, जिसे बाबू लोग अक्सर ‘विकास की महक’ कहते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय (MOSPI) ने ‘आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण’ (PLFS) नाम का एक भारी-भरकम दस्तावेज जारी किया है। इस दस्तावेज ने देश भर के नेताओं, मंत्रियों और योजना बनाने वाले ज्ञानियों के गाल पर एक ऐसा थप्पड़ जमाया है, जिसकी गूंज विंध्य की पहाड़ियों से लेकर भोपाल की ठंडी वादियों तक सुनाई दे रही है।

रिपोर्ट कहती है—रीवा में 22.3 फीसदी युवा ‘निठल्ले’ हैं!

अंग्रेजीदां अफसर इसे सभ्यता का चोला पहनाते हुए बड़ी शालीनता से NEET कहते हैं—Not in Education, Employment, or Training (ना पढ़ाई कर रहे हैं, ना कोई कमाई कर रहे हैं, और ना ही कोई हुनर सीख रहे हैं)। अखबारों ने सीधी बात कही—’निठल्ले’! और राजधानी भोपाल की हालत तो ऐसी है कि वहां बेरोजगारी ने नया कीर्तिमान कायम कर दिया है।

अब सवाल यह उठता है कि इन 22.3 फीसदी लड़कों को निठल्ला किसने बनाया? क्या ये अपनी मर्जी से चौराहों पर चाय की गुमटी के पास साइकिल का स्टैंड लगाए खड़े हैं? या फिर यह हमारी उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का चमत्कार है, जो चुनाव के समय वादों के ऐसे रंग-बिरंगे गुब्बारे फुलाती है कि आसमान ढक जाए, और चुनाव खत्म होते ही वे गुब्बारे पिचक कर कचरे के डिब्बे में जा गिरते हैं?

“हमारे देश में बेरोजगारी कोई समस्या नहीं है, यह तो नेताओं की सबसे बड़ी सुविधा है। क्योंकि अगर युवा काम पर चला जाएगा, तो फिर रैलियों में ‘जिंदाबाद’ के नारे कौन लगाएगा? पांच साल तक युवा को निठल्ला रखो, फिर आखिरी के तीन महीने उसे एक झंडा और दो सौ रुपये का पेट्रोल थमा दो—लीजिए, देश का भविष्य तैयार है!“

NEET (नॉट इन एम्प्लॉयमेंट): एक आधुनिक विडंबना

आइए, जरा इस अंग्रेजी शब्द ‘NEET’ की चीरफाड़ करें। सांख्यिकी मंत्रालय के इस नए आंकड़ों के खेल में केवल रीवा ही नहीं, देश के ढाई सौ से ज्यादा जिलों का यही हाल है, जहां 25 फीसदी से अधिक आबादी इसी श्रेणी में आती है।

इस श्रेणी में वे नवयुवक आते हैं जो एम.ए., बी.एससी., या बी.टेक. की डिग्री हाथ में लिए चौराहे की दुकान पर नमकीन का पैकेट फाड़कर किस्मत को कोस रहे हैं। इन्होंने सालों तक किताबों के पन्ने पलटे, आंखें फोड़ीं, माँ-बाप के खेत गिरवी रखवाकर ट्यूशन की फीस भरी। लेकिन जब बाजार में उतरे, तो पता चला कि उनकी डिग्री की कीमत उस रद्दी कागज़ से ज्यादा नहीं है जिसमें कचौड़ी लपेट कर दी जाती है।

नेताओं ने कहा था—“हम स्किल इंडिया बनाएंगे!”

युवाओं ने पूछा—“साहब, स्किल तो सीख ली, अब काम कहां है?”

नेताजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया—“काम ढूँढना भी तो एक स्किल है, पहले वो सीखो!”

परिणाम यह हुआ कि रीवा के 22.3 फीसदी युवा अब एक नई विद्या में पारंगत हो चुके हैं—’चौराहा शास्त्र’! सुबह उठो, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की ताजा खबर पढ़ो, किसी नेताजी के काफिले पर ताली बजाओ, और शाम को दोस्तों के साथ इस बात पर गंभीर बहस करो कि 2030 तक देश की जीडीपी कहां पहुंचेगी। अपना बैंक अकाउंट भले ही शून्य हो, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था की चिंता में इनकी नींद उड़ी हुई है।

भोपाल का रिकॉर्ड और राजधानी की लाचारी

रीवा तो चलिए विंध्य का एक जिला है, लेकिन ज़रा राज्य की छाती यानी भोपाल पर नज़र डालिए। रिपोर्ट कहती है कि सबसे ज़्यादा बेरोज़गार भोपाल में हैं। भोपाल—जहां बड़े-बड़े मंत्रालय बैठते हैं, जहां से नीतियां बनती हैं, जहां लाल बत्ती वाली गाड़ियों के सायरन से सड़कें गूंजती हैं।

उसी भोपाल में पढ़े-लिखे युवाओं की एक पूरी फौज कोचिंग संस्थानों के बाहर कतारबद्ध खड़ी है। ये वही युवा हैं जो पटवारी परीक्षा से लेकर सब-इंस्पेक्टर तक, और पीएससी से लेकर सफाईकर्मी तक की भर्ती परीक्षा के फॉर्म भरते हैं। फॉर्म भरने की फीस पांच सौ रुपये, चालान का खर्च दो सौ रुपये, और अंत में परीक्षा का परिणाम—’पेपर लीक’ या ‘कोर्ट में स्थगन’!

सरकार कहती है—“हमने नौकरियां निकाली थीं।”

युवा कहता है—“साब, निकाली तो थीं, पर वो जॉइनिंग लेटर तक पहुँचते-पूँछते बूढ़ी हो गईं!”

भोपाल का बेरोज़गार अब बेरोज़गार नहीं रहा, वह एक ‘व्यावसायिक परीक्षार्थी’ बन चुका है। उसका पेशा ही परीक्षा देना और फिर परिणाम का इंतजार करते-करते बाल सफेद कर लेना है।

बुजुर्गों का दर्द और तीन पीढ़ियों की त्रासदी

इस बेरोजगारी और निठल्लेपन का दंश सिर्फ युवा नहीं झेल रहा। इसका सबसे दर्दनाक पहलू वह बुजुर्ग बाप देख रहा है, जिसने अपनी जवानी के दिनों में अपने पेट की आंतें निचोड़कर बेटे को रीवा या भोपाल पढ़ने भेजा था।

उस बुजुर्ग ने सोचा था कि बेटा पढ़-लिखकर साहब बनेगा, घर की कच्ची छत को पक्का करवाएगा, और बुढ़ापे में उसकी लाठी बनेगा। लेकिन आज दृश्य क्या है?

अस्सी साल का बाप अपनी पेंशन के चंद रुपयों से पच्चीस साल के हट्टे-कट्टे बेटे के लिए चाय और बीड़ी का इंतजाम कर रहा है। बेटा कमरे में पंखे की हवा में बैठा मोबाइल पर ‘रील्स’ स्क्रॉल कर रहा है और बाप बाहर बैठकर सोच रहा है—“कसूर मेरा था कि मैंने इसे पढ़ाया, या कसूर इस ज़माने का है जिसने इसे बेकार बनाया?”

तीन पीढ़ियां एक साथ तबाह हो रही हैं:

  1. बुजुर्ग पीढ़ी: जो बुढ़ापे में आराम के बजाय अपने पढ़े-लिखे बेकार बेटे की चिंता में घुल रही है।
  2. युवा पीढ़ी: जो कुंठा, अवसाद और नशे की गर्त में धकेली जा रही है।
  3. आने वाली पीढ़ी: जिसे यह समझ ही नहीं आ रहा कि जब पढ़ाई का नतीजा चौराहे की निठल्लागिरी ही है, तो स्कूल जाने का फायदा क्या?

नेताओं की आत्ममुग्धता: ‘हमने तो विकास कर दिया’

अब जरा हमारे माननीय नेताओं के दृष्टिकोण पर बात करते हैं। नेता एक ऐसा प्राणी होता है जो जलते हुए जंगल में भी खड़े होकर अपनी दाढ़ी में कंघी कर सकता है।

जब ये रिपोर्ट आई होगी, तो नेताओं के दफ्तरों में हलचल जरूर हुई होगी। लेकिन हलचल बेरोजगारी मिटाने के लिए नहीं, बल्कि इस रिपोर्ट को झुठलाने के लिए हुई होगी।

नेताजी तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाएंगे और कहेंगे—“यह रिपोर्ट भ्रामक है! हमारे राज्य में कोई बेरोजगार नहीं है। जो युवा चौराहे पर खड़े हैं, वे वास्तव में ‘सामाजिक समीक्षा’ का कार्य कर रहे हैं! जो चाय की दुकान पर बैठे हैं, वे ‘स्टार्टअप’ की योजना बना रहे हैं!”

अगर आप उनसे पूछें कि नौकरियां क्यों नहीं हैं, तो वे तुरंत 100 साल पुराना इतिहास खोदकर निकाल लाएंगे। वे कहेंगे कि पिछली सरकारों ने पाप किए थे, इसलिए आज का युवा निठल्ला है! या फिर वे कोई नया नारा उछाल देंगे—“सबको आत्मनिर्भर बनना होगा!”

‘आत्मनिर्भर’ एक अद्भुत शब्द है। इसका सीधा और सरल अर्थ यह है—“हमने तुमसे वोट ले लिया, अब तुम अपना-अपना देख लो! अगर रोजगार नहीं मिलता, तो पकौड़े तलो, गुब्बारे फुलाओ या फिर हमारी रैली में झंडा लहराओ।”

राजनीतिक दल चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में, उनके लिए यह 22.3 फीसदी निठल्ले युवा केवल ‘वोट बैंक’ की कच्ची सामग्री हैं। विपक्ष कहेगा—“हम आएंगे तो सबको बेरोजगारी भत्ता देंगे।” सत्ता पक्ष कहेगा—“हम अगली बार पांच लाख नौकरियां देंगे।” वादा दोनों करते हैं, देता कोई नहीं। क्योंकि अगर युवा को सचमुच रोजगार मिल गया, तो वह आठ घंटे काम करेगा, थककर सोएगा, और नेताओं के भाषण सुनने कौन आएगा?

क्या वाकई युवा दोषी है?

सभ्य समाज अक्सर इन युवाओं को कोसता है—“आजकल के लड़के मेहनत नहीं करना चाहते, खाली बैठे रहते हैं, रील्स देखते हैं।”

लेकिन ज़रा निष्पक्ष होकर सोचिए। एक लड़का जो 15 साल तक स्कूल और कॉलेज जाता है, हर साल परीक्षाएं देता है, डिग्री हासिल करता है, जब वह सरकारी या निजी क्षेत्र में काम मांगने जाता है, तो उससे कहा जाता है—“पाँच साल का अनुभव लाओ।”

कोई पूछे कि जब पहला काम ही नहीं दोगे, तो अनुभव कहां से लाएगा? आसमान से टपकेगा?

दूसरी तरफ, जो नौकरियां निकलती भी हैं, वे संविदा पर होती हैं—चार हजार, छह हजार या आठ हजार रुपये महीने पर। आज के ज़माने में आठ हजार रुपये में तो एक परिवार का महीने भर का दूध का बिल नहीं चुकाया जा सकता, इंसान अपना भविष्य क्या बनाएगा?

जब हर रास्ता बंद दिखता है, जब हर परीक्षा में धांधली की बू आती है, जब हर नौकरी के लिए रिश्वत या सिफारिश का रेट तय होता है—तो युवा निराश होकर हाथ-पैर मारना छोड़ देता है। वह चुपचाप चौराहे की गुमटी पर बैठ जाता है और वही बनता है जिसे सरकारी रिपोर्ट ‘NEET’ या ‘निठल्ला’ कहती है। यह निठल्लापन उसकी इच्छा नहीं, उसकी मजबूरी और अवसाद का अंतिम चरण है।

विंध्य की माटी और व्यवस्था का मज़ाक

सफ़ेद शेरों की धरती, रीवा और पूरे विंध्य क्षेत्र का अपना एक इतिहास रहा है। यह माटी वीरों, विचारकों और मेहनती लोगों की रही है। लेकिन आज जब रीवा के नाम के आगे ‘22.3 फीसदी निठल्ले’ का ठप्पा लगता है, तो दिल पसीज जाता है।

क्या विंध्य के युवाओं के पास दिमाग नहीं है? क्या उनके बाजुओं में ताकत नहीं है?

ताकत भी है, दिमाग भी है। लेकिन उनके पास वे अवसर नहीं हैं जो एक विकसित समाज में होने चाहिए। उद्योगों के नाम पर खोखले दावों के झुनझुने बजाए जाते हैं। निवेशक सम्मेलन (Investor Summits) होते हैं, करोड़ों-अरबों के एमओयू (MoU) साइन होते हैं, फाइव स्टार होटलों में काजू-किशमिश खाए जाते हैं, और अंत में पता चलता है कि जमीन पर एक फैक्ट्री भी नहीं लगी।

युवा फिर वहीं का वहीं रह जाता है—हाथ में डिग्री, जेब में खाली पर्स और आँखों में गहराता अंधेरा।

परसाई शैली का कड़वा निष्कर्ष: जागने का वक्त कब आएगा?

हरिशंकर परसाई ने लिखा था कि “व्यंग्य किसी पर हंसने के लिए नहीं होता, व्यंग्य उस सड़न को दिखाने के लिए होता है जिस पर हम सब इत्र लगाकर घूम रहे हैं।”

यह PLFS की रिपोर्ट वही इत्र हटाने का काम कर रही है। रीवा का 22.3% और भोपाल का शीर्ष स्थान कोई मामूली आंकड़ा नहीं है, यह हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारी आर्थिक नीतियों और हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं का एक भयानक रिपोर्ट कार्ड है।

हे देश के युवाओं! हे रीवा और भोपाल के बेरोज़गारों! जब तक तुम नेताओं की रैलियों में ‘ज़िंदाबाद’ के नारे लगाने को ही अपना जीवन-लक्ष्य समझते रहोगे, तब तक सरकारी कागज़ों में तुम्हारा नाम ‘निठल्ला’ ही लिखा जाएगा। जब तक तुम धर्म, जाति और फालतू के मुद्दों पर आपस में लड़ते रहोगे, तब तक साहब लोग तुम्हारे नाम पर बजट का पैसा डकारते रहेंगे और तुम्हें विकास का झुनझुना थमाते रहेंगे।

और हे देश के बुजुर्गों!

अपने बेटों को सिर्फ यह मत कहिए कि ‘कुछ कमाओ’। उनसे यह भी पूछिए कि उन्होंने उन नेताओं से सवाल क्यों नहीं किया जिन्हें उन्होंने वोट दिया था?

व्यवस्था को बदलने का रास्ता चौराहे पर बैठकर कचौड़ी तोड़ने से नहीं निकलेगा। सवाल पूछने होंगे। संसद से लेकर विधानसभा तक, और पंचायत से लेकर नुक्कड़ तक—नेताओं की आँखों में आँखें डालकर पूछना होगा कि “हमारे टैक्स के पैसों से बनी डिग्रियों का मोल क्या है? हमारे युवाओं का भविष्य कहां है?”

अगर आज सवाल नहीं पूछे गए, तो अगली रिपोर्ट आएगी, उसमें रीवा का आंकड़ा 22.3% से बढ़कर 32% हो जाएगा, और हमारे नेताजी मुस्कुराते हुए एक नया भाषण देंगे—“मित्रों, हमने निठल्लों की संख्या में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की है!”

फैसला आपके हाथ में है—निठल्ला कहलाकर इतिहास के कूड़ेदान में जाना है, या सवाल पूछकर अपना हक छीनना है!

Vijay Mishra
Vijay Mishrahttp://tknprime.com
विजय मिश्रा, जिन्हें मीडिया जगत में #JournalistVijay के नाम से जाना जाता है, ज़मीनी पत्रकारिता के एक निर्भीक, संवेदनशील और जन-उन्मुख संवाहक हैं। पत्रकारिता उनके लिए कोई आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक दायित्व और जनसेवा का एक सशक्त माध्यम है। पेशागत रूप से दो दशकों (20+ वर्ष) के अनुभव वाले एक वरिष्ठ आईटी और ईआरपी (ERP) विशेषज्ञ होने के नाते, वे अपनी पेशेवर आजीविका आईटी क्षेत्र से अर्जित करते हैं। यही आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें बिना किसी दबाव, प्रलोभन या व्यावसायिक पक्षपात के बेबाक और निष्पक्ष पत्रकारिता करने की अद्वितीय ताकत देती है।ज़मीनी पत्रकारिता और जन-सरोकार विजय मिश्रा की पत्रकारिता एसी कमरों या स्टूडियो की बहसों तक सीमित न रहकर सीधे सड़कों, गांवों और चौपालों तक पहुंचती है। मध्य प्रदेश की राजनीतिक धारा, मतदाताओं की बदलती सोच और ज़मीनी हकीकत पर उनकी गहरी पकड़ है। जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण वे आम मानस की नब्ज को बखूबी समझते हैं।उनकी पत्रकारिता का मुख्य केंद्र बिंदु प्रशासनिक तंत्र की खामियों को उजागर करना और अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है:नल-जल योजना व हर घर जल में भ्रष्टाचार: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल संकट, पाइपलाइन बिछाने में हुई धांधलियों और 'हर घर नल योजना' के धरातल पर अधूरे वादों को उजागर करना।पीएम आवास योजना और राशन व्यवस्था: गरीबों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं जैसे 'प्रधानमंत्री आवास योजना' और 'राशन कार्ड' वितरण में होने वाली लालफीताशाही, कमीशनखोरी और धांधली की सीधी ग्राउंड रिपोर्टिंग।सत्ता और नीति-निर्माताओं से सीधे सवाल: नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं से सीधी मुलाकात कर उनसे जनता के ज्वलंत मुद्दों पर कड़े, तर्कसंगत और तीखे सवाल पूछना।हरिशंकर परसाई शैली का प्रभाव और व्यंग्यात्मक लेखन समय के साथ, विजय मिश्रा हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की लेखन शैली से गहराई से प्रभावित हुए हैं। वे परसाई जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी रिपोर्टिंग और आलेखों में तल्ख व्यंग्य (Satire) का प्रयोग करते हैं।राजनीतिक पाखंड, प्रशासनिक सुस्ती और सामाजिक विडंबनाओं पर प्रहार करने के लिए वे तीखे व्यंग्यात्मक तर्कों का सहारा लेते हैं। उनका मानना है कि जो बात सीधी रिपोर्टिंग से कभी-कभी दब जाती है, उसे व्यंग्य के जरिए तंत्र के ज़मीर को झकझोरने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।तकनीकी दक्षता और निष्काम समाज सेवा पत्रकारिता में उनका प्रवेश भले ही किसी विशेष परिस्थिति या सामाजिक परिस्थितियों की देन (Compulsion) रहा हो, लेकिन आज वे अपने खाली समय का उपयोग पूरी तरह से समाज-हित में करते हैं।निःस्वार्थ पत्रकारिता: पत्रकारिता से धन कमाना उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। वे अपनी आईटी पृष्ठभूमि के माध्यम से सम्मानित आजीविका कमाते हैं और पत्रकारिता के जरिए केवल पीड़ितों, वंचितों और आम जनता की मदद करते हैं।डेटा और तकनीक का उपयोग: एक वरिष्ठ आईटी पेशेवर होने के कारण वे डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल टूल्स और तकनीकी तथ्यों का उपयोग कर अपनी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक और अकाट्य बनाते हैं।विजय मिश्रा की पत्रकारिता तकनीक, व्यंग्य, ज़मीनी जुड़ाव और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक ऐसा विरल मिश्रण है, जो आम जनता के लिए उम्मीद की एक किरण और व्यवस्था के लिए एक सतर्क प्रहरी का काम करती है।

Related articles

spot_img

Recent articles

spot_img