युद्ध, अय्याशी और डॉलर: जब बंकरों से निकला ‘नाइटलाइफ़’ का स्वर्ग by Journalist Vijay

Published:

Writer: Journalist Vijay

दुनिया में जब भी दो देश आपस में लड़ते हैं, तो मासूम जनता को लगता है कि वहाँ ‘देशभक्ति’ की मुर्गियाँ दाना चुग रही हैं। लेकिन इतिहास का सबसे बड़ा सच यह है कि युद्ध सिर्फ़ लाशे ही पैदा नहीं करता, वह जाते-जाते अय्याशी के नए अड्डे भी स्थापित कर जाता है।

ताज़ा-तरीन मामला थाईलैंड के पटाया शहर का है। वही पटाया जहाँ आज के ज़ेन-ज़ी (Gen-Z) लौंडे अपने दोस्तों के साथ “वाइब्स” (Vibes) ढूँढने और इंस्टाग्राम की रील्स बनाने जाते हैं। हाल ही में अमरीका का एक नौसैनिक जहाज़ ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ (USS Abraham Lincoln) करीब 5,000 अमरीकी सैनिकों को लेकर थाईलैंड के तट पर उतरा। 286 दिनों तक समंदर में बिना नहाए-धोए रहने के बाद जब ये सैनिक ज़मीन पर उतरे, तो पटाया के मसाज पार्लरों और नाइटकलबों में अचानक दीवाली मनने लगी।

लेकिन क्या आपको पता है कि पटाया का यह ‘रंगीन इतिहास’ किसी टूरिज़्म बोर्ड ने नहीं, बल्कि अमरीकी सेना के ‘अवसाद’ और ‘डॉलर’ ने लिखा था?

मछली के जाल से मसाज पार्लर तक: वियतनाम युद्ध की देन

1960 के दशक से पहले पटाया कोई अय्याशी का अड्डा नहीं था। वह एक सीधा-साधा गाँव था जहाँ मछुआरे सुबह जाली फेंकते थे और शाम को सूखी मछली खाकर सो जाते थे।

फिर अमरीका को वियतनाम में ‘लोकतंत्र’ बचाने का कीड़ा काटा। अमरीकी सैनिक जब जंगलों में गोलियाँ खा-खाकर और बम बनाकर ऊब जाते थे, तो अमरीकी सरकार ने उनके लिए एक नई नीति निकाली—R&R यानी Rest & Recreation (विश्राम और मनोरंजन)।

सैनिकों से कहा गया—“तुम वियतनाम में लोग मारो, और छुट्टी बिताने थाईलैंड के समुद्र तट पर जाकर अपनी थकावट उतारो!”

फिर क्या था? 1967 के बाद पटाया में अमरीकी सैनिकों की बाढ़ आ गई। बंदूकें एक तरफ रखी गईं, अमरीकी डॉलर हवा में उछाले गए, और रातों-रात मछुआरों के गाँव में बार, नाइटकलब और मसाज पार्लर खुल गए। जो गाँव कल तक मछली की गंध के लिए जाना जाता था, वह इत्र और सस्ती शराब की महक से गमकने लगा।

अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो:

“साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा चमत्कार यही है। वह जहाँ भी जाता है, अपनी सहूलियत के लिए एक नया बाज़ार तैयार कर देता है। जो अमरीका दुनिया को ‘नैतिकता’ का भाषण देता था, उसी की सेना ने वियतनाम की आड़ में पटाया को ‘अंतरराष्ट्रीय अय्याशी’ की राजधानी बना दिया।”

ज़ेन-ज़ी (Gen-Z) का ‘सोलो ट्रिप’ और इतिहास का तमाचा

आज के ज़ेन-ज़ी लड़कों को लगता है कि पटाया जाना एक ‘कूल’ (Cool) अनुभव है। वे वहाँ जाकर ‘फ़ुल नाइट पार्टी’ करते हैं, ‘थाई मसाज’ के नाम पर रील्स अपलोड करते हैं और अपने दोस्तों को दिखाते हैं कि वे कितने ‘ओपन माइंडेड’ (Open-minded) हो गए हैं।

लेकिन सच्चाई यह है कि जिसे आज आप ‘नाइटलाइफ़’ और ‘टूरिज़्म’ कहते हैं, वह असल में 70 साल पुराना अमरीकी सैनिकों का छोड़ा हुआ जूठन है। जिस ज़मीन पर आज आप बैकपैक टाँगकर “फाइंडिंग माईसेल्फ़” (Finding Myself) का नाटक कर रहे हैं, उस ज़मीन की नींव गरीबी, युद्ध के डर और अमरीकी डॉलर की हवस पर रखी गई थी।

सैनिकों की वह अस्थायी ज़रूरत देखते ही देखते स्थानीय अर्थव्यवस्था का ‘स्थायी ढाँचा’ बन गई। गाँव के गरीब लोग खेत-खलिहान छोड़कर बार और मसाज पार्लरों में काम करने लगे क्योंकि बारूद से ज्यादा ताक़त डॉलर में थी।

इतिहास का कसैला सच

इस पूरी दास्तान का सार यही है कि जहाँ-जहाँ युद्ध का धुआँ उठता है, वहाँ-वहाँ बाज़ार अपना नया तंबू गाड़ लेता है।

अमरीकी सैनिक तो वियतनाम युद्ध हारकर वापस अपने देश चले गए, लेकिन पटाया को हमेशा-हमेशा के लिए एक ‘देह बाज़ार’ और ‘मसाज टाउन’ का टैग दे गए।

इसलिए, अगली बार जब आप अपने दोस्तों के साथ पटाया का टिकट बुक कराएँ और ‘सोलो ट्रिप’ का ज्ञान पेलें, तो याद रखिएगा कि आप किसी सांस्कृतिक धरोहर को देखने नहीं जा रहे—आप बस अमरीकी युद्ध नीति के 70 साल पुराने ‘मनोरंजन केंद्र’ का मुआयना करने जा रहे हैं!

अंतिम सीख:

“दुनिया में कोई भी शहर अपनी मर्ज़ी से अय्याश नहीं बनता, उसे अमीर देशों की हवस और अपनी गरीबी का समझौता ऐसा बना देता है।”

Vijay Mishra
Vijay Mishrahttp://tknprime.com
विजय मिश्रा, जिन्हें मीडिया जगत में #JournalistVijay के नाम से जाना जाता है, ज़मीनी पत्रकारिता के एक निर्भीक, संवेदनशील और जन-उन्मुख संवाहक हैं। पत्रकारिता उनके लिए कोई आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक दायित्व और जनसेवा का एक सशक्त माध्यम है। पेशागत रूप से दो दशकों (20+ वर्ष) के अनुभव वाले एक वरिष्ठ आईटी और ईआरपी (ERP) विशेषज्ञ होने के नाते, वे अपनी पेशेवर आजीविका आईटी क्षेत्र से अर्जित करते हैं। यही आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें बिना किसी दबाव, प्रलोभन या व्यावसायिक पक्षपात के बेबाक और निष्पक्ष पत्रकारिता करने की अद्वितीय ताकत देती है।ज़मीनी पत्रकारिता और जन-सरोकार विजय मिश्रा की पत्रकारिता एसी कमरों या स्टूडियो की बहसों तक सीमित न रहकर सीधे सड़कों, गांवों और चौपालों तक पहुंचती है। मध्य प्रदेश की राजनीतिक धारा, मतदाताओं की बदलती सोच और ज़मीनी हकीकत पर उनकी गहरी पकड़ है। जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण वे आम मानस की नब्ज को बखूबी समझते हैं।उनकी पत्रकारिता का मुख्य केंद्र बिंदु प्रशासनिक तंत्र की खामियों को उजागर करना और अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है:नल-जल योजना व हर घर जल में भ्रष्टाचार: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल संकट, पाइपलाइन बिछाने में हुई धांधलियों और 'हर घर नल योजना' के धरातल पर अधूरे वादों को उजागर करना।पीएम आवास योजना और राशन व्यवस्था: गरीबों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं जैसे 'प्रधानमंत्री आवास योजना' और 'राशन कार्ड' वितरण में होने वाली लालफीताशाही, कमीशनखोरी और धांधली की सीधी ग्राउंड रिपोर्टिंग।सत्ता और नीति-निर्माताओं से सीधे सवाल: नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं से सीधी मुलाकात कर उनसे जनता के ज्वलंत मुद्दों पर कड़े, तर्कसंगत और तीखे सवाल पूछना।हरिशंकर परसाई शैली का प्रभाव और व्यंग्यात्मक लेखन समय के साथ, विजय मिश्रा हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की लेखन शैली से गहराई से प्रभावित हुए हैं। वे परसाई जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी रिपोर्टिंग और आलेखों में तल्ख व्यंग्य (Satire) का प्रयोग करते हैं।राजनीतिक पाखंड, प्रशासनिक सुस्ती और सामाजिक विडंबनाओं पर प्रहार करने के लिए वे तीखे व्यंग्यात्मक तर्कों का सहारा लेते हैं। उनका मानना है कि जो बात सीधी रिपोर्टिंग से कभी-कभी दब जाती है, उसे व्यंग्य के जरिए तंत्र के ज़मीर को झकझोरने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।तकनीकी दक्षता और निष्काम समाज सेवा पत्रकारिता में उनका प्रवेश भले ही किसी विशेष परिस्थिति या सामाजिक परिस्थितियों की देन (Compulsion) रहा हो, लेकिन आज वे अपने खाली समय का उपयोग पूरी तरह से समाज-हित में करते हैं।निःस्वार्थ पत्रकारिता: पत्रकारिता से धन कमाना उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। वे अपनी आईटी पृष्ठभूमि के माध्यम से सम्मानित आजीविका कमाते हैं और पत्रकारिता के जरिए केवल पीड़ितों, वंचितों और आम जनता की मदद करते हैं।डेटा और तकनीक का उपयोग: एक वरिष्ठ आईटी पेशेवर होने के कारण वे डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल टूल्स और तकनीकी तथ्यों का उपयोग कर अपनी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक और अकाट्य बनाते हैं।विजय मिश्रा की पत्रकारिता तकनीक, व्यंग्य, ज़मीनी जुड़ाव और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक ऐसा विरल मिश्रण है, जो आम जनता के लिए उम्मीद की एक किरण और व्यवस्था के लिए एक सतर्क प्रहरी का काम करती है।

Related articles

spot_img

Recent articles

spot_img