इतिहास की अलमारी से निकला ‘गुलाम’ और भारत का पहला ‘आज़ाद’

Published:

1914 की ख़िलाफ़त तकरीर से लेकर 1947 के बाद शिक्षा मंत्रालय के विवादित फैसलों तक—जानिए स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद का एक ऐसा सच, जिसे इतिहास की किताबों ने सफेदी पोतकर छिपा दिया था।

क्या स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद की छवि वैसी ही थी जैसी हमें किताबों में पढ़ाई गई? 1914 का ख़िलाफ़त भाषण, जिन्ना के साथ रणनीतिक मतभेद, और आत्मकथा के वे 30 मुहरबंद पन्ने जिन्होंने नेहरू और पटेल की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए—देखिए इतिहास के छिपे हुए पन्नों का Journalist Vijay की शैली में एक तीखा और बेबाक विश्लेषण!

भारत का इतिहास और उसकी स्कूली किताबें दो ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो पेट में हँसी से ज़्यादा मरोड़ उठती है। हमारे यहाँ इतिहास लिखने वालों की एक ही मूल नीति रही है—जो सच कड़वा हो, उस पर ‘धर्मनिरपेक्षता’ की सफेदी पोत दो; और जो व्यक्ति पूजनीय बनाना हो, उसके सारे ऐब इतिहास की पुरानी दरी के नीचे सरका दो!

लेकिन इतिहास भी बड़ा कमीना होता है। आप उसे जितना दबाने की कोशिश करेंगे, वह सही समय पर किसी पुरानी फाइल, किसी 1914 के भाषण या किसी sealed (मुहरबंद) पन्ने की तरह बाहर आकर राष्ट्रीय नेताओं की मूर्तियों पर धूल जमा देता है।

ताज़ा-तरीन मामला स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री, ‘भारत रत्न’ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद साहब का है। सोशल मीडिया के आधुनिक चौपाल पर जब लेखक आनंद रंगनाथन और गीतकार जावेद अख़्तर के बीच बहस छिड़ी, तो 1914 के कुछ ऐसे पन्ने बाहर निकल आए जिन्हें देखकर हमारे सेक्युलर मठाधीशों का हाज़मा बिगड़ गया।

जिस व्यक्ति को हमने अपनी किताबों में “हिंदू-मुस्लिम एकता का मसीहा” और “सहिष्णुता का देवता” बनाकर पढ़ाया, उनका 1910 से 1920 का अवतार देखकर लगता है कि इतिहास हमें आधा सच बोलकर पूरी फ़ीस वसूलता रहा है!

मक्का से कलकत्ता: ‘गुलाम’ से ‘आज़ाद’ बनने की लीला

अबुल कलाम आज़ाद का बचपन मक्का में बीता। जन्म से ही उनका नाम ‘अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन’ था। उनके अब्बा हुज़ूर एक कट्टर इस्लामी विद्वान थे। छोटी सी उम्र में ही आज़ाद साहब ने दीनी तालीम में ऐसा झंडा गाड़ा कि 13 साल की उम्र में वे अपने से दोगुनी उम्र के दाढ़ी वाले बुज़ुर्गों को धर्म का पाठ पढ़ाने लगे।

फिर वे किशोरावस्था में सर सैयद अहमद ख़ान के विचारों से प्रभावित हुए। थोड़े समय के लिए दिमाग़ की खिड़की खुली, तो अपना नाम ‘आज़ाद’ रख लिया। लेकिन यह ‘आज़ादी’ ज़्यादा दिन नहीं टिकी। जल्द ही उन्होंने ‘अल-हिलाल’ नाम का अख़बार निकाला।

कहने को तो ‘अल-हिलाल’ ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ था, पर उसकी आत्मा में पैन-इस्लामवाद (Pan-Islamism) यानी ‘वैश्विक इस्लामी भ्रातृत्व’ का ऐसा बुखार चढ़ा हुआ था कि जिसकी कोई दवा उस ज़माने में नहीं थी।

27 अक्तूबर 1914 को कलकत्ता के एक बहुत बड़े जलसे में 26 साल के नौजवान मौलाना आज़ाद ने जो तकरीर (भाषण) दी, उसकी भाषा अगर आज का कोई नेता बोल दे, तो उस पर उसी वक़्त दस कड़े क़ानून लागू हो जाएँगे। उस समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा हुआ था और ओटोमन साम्राज्य (तुर्की का ख़लीफ़ा) ब्रिटेन के ख़िलाफ़ खड़ा था। मौलाना ने बड़े गर्व से घोषणा की कि मुसलमान का पहला और आख़िरी फर्ज़ अपने मज़हब और ख़लीफ़ा के प्रति है, किसी ज़मीनी या भौगोलिक देश के प्रति नहीं!

मैं तो कहता हूँ कि:

“मज़हबी जुनून की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह इंसान को अपनी ज़मीन पर पैर टिकाने नहीं देता। वह उसे हमेशा किसी दूर देश के राजा या ख़लीफ़ा का वफ़ादार बनाकर अपने ही घर में आग लगाने का हुनर सिखाता है।“

महात्मा गांधी और ख़िलाफ़त की ऐतिहासिक ‘नाश्ते की मेज़’

अब आइए इतिहास के उस महान तमाशे पर, जिसे हम “non-cooperation movement” यानी असहयोग आंदोलन कहते हैं।

1919-1920 में जब तुर्की में ख़लीफ़ा की सत्ता ख़तरे में पड़ी, तो भारत के मुसलमानों ने ‘ख़िलाफ़त आंदोलन’ शुरू कर दिया। अब सवाल यह था कि भारत की आज़ादी का तुर्की के ख़लीफ़ा से क्या लेना-देना? लेकिन महात्मा गांधी को लगा कि यह तो ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ का ऐसा रेडीमेड मसाला है, जिसे अगर आज़ादी के दाल-चावल में डाल दिया जाए, तो रामराज्य का स्वाद आ जाएगा!

गांधी जी ने ख़िलाफ़त आंदोलन को कांग्रेस का समर्थन दे दिया, और मौलाना आज़ाद इस पूरे सौदे के मुख्य दलाल (माफ़ कीजिए, मध्यस्थ) बने।

मोहम्मद अली जिन्ना—जो उस समय तक एक सूट-बूट पहनने वाले धर्मनिरपेक्ष वकील थे—ने गांधी जी को चेतावनी दी थी कि “मज़हबी कट्टरपंथियों को राजनीति के मैदान में मत उतारो, यह देश के लिए आत्मघाती होगा।“ लेकिन गांधी नहीं माने।

परिणाम क्या हुआ? ख़िलाफ़त आंदोलन तो तुर्की में अतातुर्क के आते ही फुस्स हो गया, लेकिन भारत में उसने मोपला नरसंहार और सांप्रदायिक दंगों की ऐसी फसल बो दी, जिसकी कटाई आज तक जारी है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने बाद में अपनी किताब में साफ़ लिखा था कि ख़िलाफ़त आंदोलन को समर्थन देकर कांग्रेस ने भारतीय राजनीति में जिस मज़हबी सांप्रदायिकता को खाद-पानी दिया, उसी ने आगे चलकर देश के टुकड़े किए।

आज़ाद ने विभाजन का विरोध क्यों किया? (एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ भ्रम)

स्कूली किताबों में हमें रटाया गया कि मौलाना आज़ाद ने पाकिस्तान के निर्माण का कड़ा विरोध किया क्योंकि वे ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ चाहते थे। यह आधा सच है।

आज़ाद का अपनी किताब ‘इंडिया विन्स फ़्रीडम’ और भाषणों में तर्क बिल्कुल अलग था। वे कोई आधुनिक धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं थे, वे एक दूरदर्शी इस्लामी रणनीतिकार (Islamic Strategist) थे।

आज़ाद का कहना था कि पाकिस्तान बनने से भारतीय महाद्वीप के मुसलमान तीन टुकड़ों में बँट जाएँगे—एक हिस्सा भारत में, एक पश्चिम पाकिस्तान में और एक पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) में। इससे मुसलमानों की ताक़त बिखर जाएगी।

उनका मानना था कि अगर पूरा भारत एक रहे, तो 30 से 35 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के साथ वे पूरे भारत की राजनीति पर ‘वीटो पावर’ रखेंगे और केंद्र सरकार को अपनी उंगलियों पर नचा सकेंगे।

अर्थात, आज़ाद पाकिस्तान के विरोधी इसलिए नहीं थे कि उन्हें भारत से प्रेम था, बल्कि इसलिए थे क्योंकि उन्हें ‘छोटा पाकिस्तान’ मंज़ूर नहीं था—वे पूरे भारत में मुसलमानों का दबदबा देखना चाहते थे!

शिक्षा मंत्री की कुर्सी और इतिहास की ‘अदृश्य सफ़ाई’

1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तो मौलाना आज़ाद को देश का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे 1958 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर विराजमान रहे।

एक शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने IIT, IISc और UGC जैसे शानदार संस्थान बनाए—इस बात का श्रेय उन्हें ज़रूर मिलना चाहिए। लेकिन उन्होंने शिक्षा के नाम पर जो ‘सांस्कृतिक सफ़ाई’ की, वह देश आज तक भुगत रहा है।

                  मौलाना आज़ाद का शिक्षा मॉडल (1947-1958)

        │

      ┌──────────────────────────────┴──────────────────────────────┐

      ▼                                                             ▼

 [ संस्थागत निर्माण ]                                       [ पाठ्यक्रम का विवाद ]

 • IIT और UGC की स्थापना                                   • मुग़ल/मध्यकालीन इतिहास का महिमामंडन

 • ललित कला व साहित्य अकादमी                               • प्राचीन भारतीय/वैदिक परंपराओं का बहिष्कार

 • उच्च तकनीकी शिक्षा पर ज़ोर                                • प्राथमिक साक्षरता की घोर अनदेखी (<25%)

  1. इतिहास की पच्चीकारी: आज़ाद के कार्यकाल में इतिहास लिखने की ज़िम्मेदारी ऐसे लोगों को दी गई, जिन्होंने मुग़ल काल और मध्यकालीन आक्रांताओं का ऐसा महिमामंडन किया मानो वे भारत में शांतिदूत बनकर आए थे। मंदिर तोड़ना, जजिया कर लगाना और कत्लेआम करना—इन सब पर ‘सद्भावना’ का पर्दा डाल दिया गया।
  2. भारतीय ज्ञान परंपरा से परहेज़: जब डॉ. के.एम. मुंशी और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे नेताओं ने सुझाव दिया कि भारत के नए शिक्षा तंत्र में संस्कृत, वैदिक दर्शन और प्राचीन भारतीय ज्ञान को शामिल किया जाना चाहिए, तो मौलाना आज़ाद ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि यह “सांप्रदायिक” हो जाएगा।
  3. प्राथमिक शिक्षा का जनाज़ा: आज़ाद ने बड़े-बड़े IIT तो खोल दिए, लेकिन गाँव के गरीब बच्चों के लिए प्राथमिक स्कूलों पर कोई ध्यान नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि 1958 तक भारत की साक्षरता दर 25% भी नहीं पहुँच पाई थी।

30 पन्नों का सीलबंद ‘डायनामाइट’

मौलाना आज़ाद की राजनीति का सबसे दिलचस्प ड्रामा उनकी आत्मकथा ‘इंडिया विन्स फ़्रीडम’ (India Wins Freedom) के साथ हुआ।

जब उन्होंने 1950 के दशक में अपने सचिव हुमायूँ कबीर को अपनी आत्मकथा लिखवाई, तो उन्होंने निर्देश दिया कि इस किताब के 30 पन्ने उनकी मौत के 30 साल बाद तक नेशनल आर्काइव्स में मुहरबंद (Sealed) रखे जाएँ।

वे जानते थे कि अगर ये 30 पन्ने उनकी ज़िंदगी में बाहर आ गए, तो उनके अपने साथी नेहरू और पटेल उनका जीना हराम कर देंगे!

1988 में जब ये 30 पन्ने अदालत के आदेश के बाद खोले गए, तो एक भयानक राजनीतिक भूचाल आया। इन पन्नों में आज़ाद ने देश के बंटवारे का पूरा ठीकरा जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के सिर पर फोड़ा था:

  • 1937 की भूल: आज़ाद ने लिखा कि 1937 में जब संयुक्त प्रांत (UP) में चुनाव हुए, तो नेहरू की हठधर्मिता के कारण मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन नहीं हो सका। नेहरू ने जिन्ना से कहा कि मुस्लिम लीग का कांग्रेस में विलय करो, तभी सरकार में लेंगे। इसी अपमान ने जिन्ना को पाकिस्तान की राह पर ढकेल दिया।
  • 1946 की प्रेस कांफ्रेंस: 1946 में कैबिनेट मिशन प्लान के तहत एक अखंड भारत बनने वाला था, जिसमें जिन्ना भी मान चुके थे। लेकिन नेहरू ने प्रेस कांफ्रेंस करके बयान दे दिया कि “कांग्रेस कैबिनेट मिशन की शर्तों से बंधी नहीं है।” जिन्ना ने तुरंत इसका फ़ायदा उठाया और ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (Direct Action Day) की घोषणा कर दी, जिससे देश में ख़ून की नदियाँ बह गईं। आज़ाद ने साफ़ लिखा: “जवाहरलाल के उस बयान ने जिन्ना को वह मौक़ा दे दिया, जिसकी वह तलाश कर रहा था।“
  • सरदार पटेल पर हमला: आज़ाद ने पटेल पर आरोप लगाया कि वे जिन्ना से भी बड़े ‘टू-नेशन थ्योरी’ के समर्थक बन चुके थे और उन्होंने ही सबसे पहले बंटवारे के काग़ज़ों पर दस्तखत करने की ज़िद की थी।

Journalist Vijay छाप निष्कर्ष:

इतिहास किसी की जागीर नहीं होता। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद न तो कोई पूर्ण ‘शैतान’ थे और न ही कोई निर्दोष ‘संत’। वे अपने दौर के एक अत्यंत चतुर, धर्मशास्त्र में पारंगत और अवसरवादी राजनीतिज्ञ थे।

1914 में वे ख़िलाफ़त के नाम पर मुस्लिम युवाओं को भड़का रहे थे; 1920 में वे गांधी जी के साथ अहिंसा का पाठ पढ़ रहे थे; 1947 के बाद वे भारत को ‘आधुनिक और सेक्युलर’ बनाने का नाटक कर रहे थे; और 1957 में मरते-मरते अपनी किताब में नेहरू-पटेल की चुग़ली का 30 पन्नों का बम छोड़ गए थे!

सही शब्दों में अगर कहें:

“हमारे देश में महापुरुषों को बनाने की एक ही फैक्टरी है। पहले उनका एक अच्छा–सा बुत बनाओ, उस पर माला पहनाओ, और अगर उस बुत के पीछे कोई कड़वा सच छिपा हो, तो देखने वाले की आँख में ‘देशभक्ति’ की धूल झोंक दो। लेकिन सच वह कमबख्त चीज़ है, जो कब्र से भी अपने हाथ बाहर निकालकर सच का इशारा कर देती है।“

आज जब हम मौलाना आज़ाद के पूरे जीवन को देखते हैं, तो हमें समझ आता है कि भारत का इतिहास वही नहीं है जो हमें NCERT की किताबों में पढ़ाया गया। असली इतिहास किताबों के बाहर, 1914 के भाषणों और 1988 में खुले 30 मुहरबंद पन्नों के बीच साँस ले रहा है!

Vijay Mishra
Vijay Mishrahttp://tknprime.com
विजय मिश्रा, जिन्हें मीडिया जगत में #JournalistVijay के नाम से जाना जाता है, ज़मीनी पत्रकारिता के एक निर्भीक, संवेदनशील और जन-उन्मुख संवाहक हैं। पत्रकारिता उनके लिए कोई आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक दायित्व और जनसेवा का एक सशक्त माध्यम है। पेशागत रूप से दो दशकों (20+ वर्ष) के अनुभव वाले एक वरिष्ठ आईटी और ईआरपी (ERP) विशेषज्ञ होने के नाते, वे अपनी पेशेवर आजीविका आईटी क्षेत्र से अर्जित करते हैं। यही आर्थिक स्वतंत्रता उन्हें बिना किसी दबाव, प्रलोभन या व्यावसायिक पक्षपात के बेबाक और निष्पक्ष पत्रकारिता करने की अद्वितीय ताकत देती है।ज़मीनी पत्रकारिता और जन-सरोकार विजय मिश्रा की पत्रकारिता एसी कमरों या स्टूडियो की बहसों तक सीमित न रहकर सीधे सड़कों, गांवों और चौपालों तक पहुंचती है। मध्य प्रदेश की राजनीतिक धारा, मतदाताओं की बदलती सोच और ज़मीनी हकीकत पर उनकी गहरी पकड़ है। जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने के कारण वे आम मानस की नब्ज को बखूबी समझते हैं।उनकी पत्रकारिता का मुख्य केंद्र बिंदु प्रशासनिक तंत्र की खामियों को उजागर करना और अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना है:नल-जल योजना व हर घर जल में भ्रष्टाचार: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल संकट, पाइपलाइन बिछाने में हुई धांधलियों और 'हर घर नल योजना' के धरातल पर अधूरे वादों को उजागर करना।पीएम आवास योजना और राशन व्यवस्था: गरीबों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं जैसे 'प्रधानमंत्री आवास योजना' और 'राशन कार्ड' वितरण में होने वाली लालफीताशाही, कमीशनखोरी और धांधली की सीधी ग्राउंड रिपोर्टिंग।सत्ता और नीति-निर्माताओं से सीधे सवाल: नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और निर्णयकर्ताओं से सीधी मुलाकात कर उनसे जनता के ज्वलंत मुद्दों पर कड़े, तर्कसंगत और तीखे सवाल पूछना।हरिशंकर परसाई शैली का प्रभाव और व्यंग्यात्मक लेखन समय के साथ, विजय मिश्रा हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की लेखन शैली से गहराई से प्रभावित हुए हैं। वे परसाई जी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी रिपोर्टिंग और आलेखों में तल्ख व्यंग्य (Satire) का प्रयोग करते हैं।राजनीतिक पाखंड, प्रशासनिक सुस्ती और सामाजिक विडंबनाओं पर प्रहार करने के लिए वे तीखे व्यंग्यात्मक तर्कों का सहारा लेते हैं। उनका मानना है कि जो बात सीधी रिपोर्टिंग से कभी-कभी दब जाती है, उसे व्यंग्य के जरिए तंत्र के ज़मीर को झकझोरने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।तकनीकी दक्षता और निष्काम समाज सेवा पत्रकारिता में उनका प्रवेश भले ही किसी विशेष परिस्थिति या सामाजिक परिस्थितियों की देन (Compulsion) रहा हो, लेकिन आज वे अपने खाली समय का उपयोग पूरी तरह से समाज-हित में करते हैं।निःस्वार्थ पत्रकारिता: पत्रकारिता से धन कमाना उनका उद्देश्य कभी नहीं रहा। वे अपनी आईटी पृष्ठभूमि के माध्यम से सम्मानित आजीविका कमाते हैं और पत्रकारिता के जरिए केवल पीड़ितों, वंचितों और आम जनता की मदद करते हैं।डेटा और तकनीक का उपयोग: एक वरिष्ठ आईटी पेशेवर होने के कारण वे डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल टूल्स और तकनीकी तथ्यों का उपयोग कर अपनी रिपोर्टिंग को अधिक प्रामाणिक और अकाट्य बनाते हैं।विजय मिश्रा की पत्रकारिता तकनीक, व्यंग्य, ज़मीनी जुड़ाव और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक ऐसा विरल मिश्रण है, जो आम जनता के लिए उम्मीद की एक किरण और व्यवस्था के लिए एक सतर्क प्रहरी का काम करती है।

Related articles

spot_img

Recent articles

spot_img