हमारे इस लोकतांत्रिक और विकासशील देश में किसी सरकारी इमारत का बनकर तैयार हो जाना ही अपने आप में एक आठवाँ अजूबा है। लेकिन इमारत बनने के बाद उसका ‘संचालन’ शुरू होना असल में उस नौवें अजूबे जैसा है, जो केवल नेताओं के फीता काटने के शुभ मुहूर्त पर निर्भर करता है। त्योंथर का नवीन तहसील भवन भी पिछले कुछ समय से इसी आलौकिक और दिव्य मुहूर्त की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए खड़ा है। भवन बनकर तैयार है, लेकिन सरकार और प्रशासन के पास शायद फीता काटने वाला वह चमकीला कैंची-धागा अभी तक बाजार से खरीदकर नहीं आ पाया है।
सफ़ेद शेरों के समाज में भ्रष्टाचार अब कोई अपराध या अवगुण नहीं रह गया है; वह तो व्यवस्था की रगों में दौड़ने वाला ‘ग्लूकोज’ है। भ्रष्टाचार अब नया New Normal है, जिसे सरकार, सिस्टम और समाज ने बड़ी आत्मीयता से स्वीकार कर लिया है।
रीवा के त्योंथर तहसील में बनें नए तहसील भवन की दीवारें चीख-चीख कर अपनी घटिया निर्माण सामग्री की कहानी बयाँ कर रही हैं। लोगों ने भी चिल्ला-चिल्लाकर धांधली और भ्रष्टाचार की ओर उँगली उठाई, लेकिन बहरे कानों को केवल कागजों की खड़खड़ाहट सुनाई देती है, आम जनता की चीख नहीं। जब भ्रष्टाचार को ही राष्ट्रीय चरित्र का दर्जा मिल चुका हो, तो घटिया सीमेंट से बनी इमारत पर सवाल उठाना ही एक अनैतिक कृत्य मान लिया जाता है!
असली Comedy तो यह है कि जो पुरानी अस्थायी तहसील चल रही है, वहाँ तक पहुँचने के लिए न तो कोई ढंग का व्यावसायिक साधन (Commercial Transport) उपलब्ध है और न ही कोई सुगम रास्ता। किसान और आम नागरिक किलोमीटरों पैदल चलकर, धूल फाँकते हुए, किसी तरह वहाँ पहुँचते हैं। इसके साथ एक और समस्या यह रही की दूरी होने की वजह से ज़्यादातर वक़ील तहसील जाना नहीं चाहते क्योंकि उनकी भी वही समस्या है, वर्तमान तहसील तक पहुंचना।
जनता भगवान से रोज प्रार्थना कर रही है कि हे प्रभु! नया भवन शुरू करवा दो, ताकि कम से कम वहाँ पहुँचने की शारीरिक यात्रा थोड़ी आसान हो सके। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि न्याय की नई दुकान पर भी सामान वही पुराना ही मिलेगा, लेकिन कम से कम दुकान तक पहुँचने का किराया और घुटनों का दर्द तो थोड़ा कम होगा!
तहसीलें असल में न्याय का मंदिर नहीं, बल्कि ‘तारीखों का अजायबघर’ हैं। सनी देओल ने फिल्मों में अदालत के लिए कहा था कि “तारीख पर तारीख मिलती है, न्याय नहीं मिलता।” लेकिन वे शायद त्योंथर तहसील आना भूल गए थे। तहसील में न्याय का मतलब है—पटवारी, तहसीलदार और बाबू की वो त्रिमूर्ति, जो एक सीधे-सादे किसान को जीवन का असली ‘वेदांत’ सिखा देती है।
75 वर्ष के एक बुजुर्ग किसान पिछले दो सालों से महीने में दो-दो बार तहसील के चक्कर काट रहे हैं। भ्रस्ट पटवारी ने ‘सुविधा शुल्क’ की चाशनी की मिठास चखी और बिना नजरी नक्शा देखे, बिना किसान को इत्तला दिए, घर बैठे-बैठे नक्शे पर कलम की ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक की कि किसान का पूरा खेत कागज़ों में पड़ोसी के आँगन में उतर गया!
अब वह 75 साल का बूढ़ा लाठी टेकते हुए अपनी ही जमीन को अपनी साबित करने के लिए तहसील की सीढ़ियाँ घिस रहा है। अगर यह चक्कर एक-दो बार का होता, तो इसे लोकतांत्रिक व्यायाम मानकर दिल को तसल्ली दी जा सकती थी। लेकिन यहाँ तो तारीखें ऐसे बँटती हैं जैसे किसी मुफ़्त के लंगर में पूरी-भाजी बँट रही हो—ले जाओ, जितनी मर्जी!
बुजुर्ग ठहरे पुराने ज़माने के आदमी; वे कानून और न्याय व्यवस्था की इज़्ज़त करते हैं, इसलिए एक भी तारीख मिस नहीं करते। लाठी टेकते आते हैं, रजिस्टर में अपनी हाज़िरी दर्ज करते हैं, अगली तारीख के सामने दस्तखत करते हैं और भारी मन से लौट जाते हैं। लेकिन सामने वाली पार्टी? वह कभी नहीं आती। रजिस्टर उठाकर देखिए—पचासों तारीखों में केवल इस बूढ़े के दस्तखत की दफ़न गवाही है और सामने वाले का कॉलम ब्लैंक!
लेकिन तहसील में कुर्सियों पर विराजमान साहबों को यह सब नहीं दिखता। उनकी आँखों पर ‘सुविधा शुल्क’ का मोतियाबिंद जो चढ़ा हुआ है! शायद यह इकलौते बुजुर्ग नहीं हैं जो इस भ्रष्ट व्यवस्था की बलि चढ़ रहे हों। तहसील त्योंथर के इस संगठित भ्रष्टाचार के दीमक में न जाने कितने नौजवानों का भविष्य और बुजुर्गों का बचा-खुचा जीवन घिसकर स्वाहा हो रहा है।”
किसानों और नागरिकों की समझदारी की दाद देनी पड़ेगी। वे अब इतने ज्ञानी हो चुके हैं कि उन्हें व्यवस्था से न्याय की कोई उम्मीद नहीं बची। वे जानते हैं कि नया भवन शुरू हो जाने से पटवारी की नीयत या तहसीलदार का चरित्र रातों-रात राजा हरिश्चंद्र जैसा नहीं हो जाएगा। लेकिन कम से कम नए भवन तक पहुँचने का साधन मिल जाएगा, तो हर तारीख पर धक्के खाने में थोड़ी सहूलियत हो जाएगी!
इस पूरे तमाशे में स्थानीय नेतृत्व—चाहे वे क्षेत्रीय सांसद हों या माननीय विधायक जी—उनकी भूमिका किसी मूक दर्शक से भी ज्यादा रहस्यमयी है। चुनाव के समय यही नेता जी जनता के चरणों में लोटकर ‘सेवक’ बनने का नाटक करते हैं, लेकिन जब बनकर तैयार पड़ी तहसील का ताला खुलवाने की बात आती है, तो वे किसी अज्ञात समाधि में चले जाते हैं। उधर प्रशासनिक तंत्र के आला हुक्मरान—माननीय कलेक्टर (DM) और तहसीलदार साहब—शायद इस इंतजार में हैं कि जब तक फाइलों के ऊपर धूल की एक-दो इंच मोटी परत न जम जाए, तब तक नए भवन का उद्घाटन करना नियमों के खिलाफ माना जाएगा!
इस प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही से तंग आकर अब अधिवक्ता संघ त्योंथर ने मोर्चा संभाला है। माननीय एसडीएम श्री राकेश चौरसिया जी को ज्ञापन देकर स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि 26 सितंबर तक नवीन तहसील भवन से कामकाज शुरू नहीं हुआ, तो उसी दिन से भवन के सामने अनिश्चितकालीन धरना और राजस्व न्यायालय का बहिष्कार किया जाएगा।
वकील न्याय व्यवस्था का मुख्य स्तंभ होते हैं, जिनका प्राथमिक कार्य अदालत में कानून का पालन करवाना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होता है। इसके बावजूद, जब वकीलों को स्वयं सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन (protest) करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो यह प्रशासनिक या न्यायिक व्यवस्था में किसी गंभीर विकार का संकेत देता है।
यह किसी एक वकील या किसान की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, यह त्योंथर के पूरे समाज की उस हताशा का विस्फोट है जो इस सड़े हुए सिस्टम को झेलते-झेलते थक चुका है। अब देखना यह है कि 26 सितंबर की तारीख आने पर प्रशासन का ताला खुलता है, या फिर जनता की किस्मत पर एक और नई तारीख चिपका दी जाती है!



