— Journalist Vijay Mishra की शैली में
बहुत दिन हुए, जब मैंने एक बार खटारा बस की यात्रा की थी। तब मैं समझता था कि बस सिर्फ लोहे, रबर और पुरानी पेट्रोल की बदबू से बनती है। पर अब आधुनिक लोकतंत्र और प्रबंधन शास्त्र ने हमें सिखा दिया है कि बस केवल एक वाहन नहीं है; वह तो अंतहीन ‘टेंडर’, ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’ (PPP) और ‘दस परसेंट के हफ़्ते’ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाला एक दार्शनिक ढांचा है।
मध्य प्रदेश की पावन धरा पर इन दिनों एक नया आंदोलन चल रहा है—’मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’। जब भी सरकार किसी योजना के नाम में ‘सुगम’ जोड़ती है, तो आम नागरिक को तुरंत अपने जुराबों के छेद और जूतों के तले जांच लेने चाहिए। इतिहास गवाह है कि जब-जब मार्ग ‘सुगम’ हुआ है, तब-तब यात्री का कटने वाला टिकट और ‘जेब का रास्ता’ बेहद सुचारू हुआ है।
भूतपूर्व सरकारी खटारा और वर्तमान प्राइवेट मक्खन
बात कुछ यूं है कि जब साल 2005 में ‘मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम’ (MPSRTC) की बलि दी गई, तब सरकार ने एक बहुत ही पवित्र सिद्धांत अपनाया—”हमें बसें चलाने के झंझट में क्यों पड़ना? हम तो शासन करेंगे!”
निगम बंद हुआ, तो सड़कें सुनसान नहीं हुईं। वहां अवतरित हुए निजी बस मालिक। यह वही वर्ग है जो अपनी 40 सीटर बस में 80 सवारियां बिठाने का हुनर जानता है और छत पर तीन गधे और दो मोटरसाइकिलें बांधकर भी ड्राइवर से कहता है, “अरे भाई, थोड़ा आगे खिसको, दो सवारी और बैठ जाएंगी!”
अब सरकार को अचानक बीस साल बाद याद आया कि अरे, ये निजी बस वाले तो बिना किसी सरकारी कागजी फॉर्म के मुनाफा कमा रहे हैं! यह तो सरासर अन्याय है। अगर कोई नागरिक एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है, और बीच में किसी सरकारी महकमे, स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) या दलाल कंपनी को कोई ‘कट’ नहीं मिल रहा, तो यह लोकतंत्र की आत्मा का अपमान है।
लगता है कि बस, इसी पावन सोच से पैदा हुई ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’।
क्या है यह अद्भुत लीला?
सरकार ने कहा, “हम बसें नहीं खरीदेंगे। बस खरीदना तो पूंजीपतियों का काम है। हम तो नियम बनाएंगे, और नियम भी ऐसे कि निजी बस वाला रोए और यात्री समझे कि उसका उद्धार हो रहा है।”
योजना के अंतर्गत पूरे मध्य प्रदेश को सात दिव्य अंचलों में बांटा गया है: भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन, सागर और रीवा। इन सातों धामों में सात ‘कंपनी’ (SPV) बनाई गई हैं। इनके ऊपर एक महा-कंपनी बैठी है, ‘मध्य प्रदेश यात्री परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड’ (MPYPIL)।
कैबिनेट ने इस महा-कंपनी को 101.20 करोड़ रुपये का ‘बीज धन’ (Seed Capital) भेंट किया है। यह बीज किस चीज़ का है? यह बीज है कागजी दफ्तरों, आलीशान एसी कमरों, नई कुर्सियों और अफसरों की टी-पार्टियों का!
अब व्यवस्था देखिए कितनी अनुपम है:
- बस किसकी? निजी ऑपरेटर की।
- ड्राइवर–कंडक्टर किसका? निजी ऑपरेटर का।
- डीजल का खर्चा किसका? निजी ऑपरेटर का।
- सड़क की खड्डों में रीढ़ की हड्डी किसकी टूटेगी? आम यात्री की।
- और 10% की वसूली किसकी? उस सरकारी कंपनी की, जिसने न एक लीटर पेट्रोल खरीदा, न एक नया पहिया लगाया!
इसे कहते हैं शुद्ध, अहिंसक और आधुनिक दोहन।
‘ग्रॉस कॉस्ट’ बनाम ‘नेट कॉस्ट’: अर्थशास्त्र का नया सर्कस
इस पूरी नौटंकी में दो बड़े कठिन अंग्रेजी शब्द उछाले जा रहे हैं—’Gross Cost Contract’ (GCC) और ‘Net Cost Contract’ (NCC)।
आसान हिंदी में इसे यूं समझिए:
नेट कॉस्ट (NCC) का मतलब है—”बस चलाओ, सवारी से किराया खुद वसूल करो, और अगर बस खाली रही तो भूखे मरो!” इसमें सारा जोखिम बस वाले का होता है।
ग्रॉस कॉस्ट (GCC) का मतलब है—”बस चलाओ, सरकारी GPS लगवाओ, और हमें हर किलोमीटर का हिसाब दो। सवारी बैठे न बैठे, सरकार तुम्हें 55 से 75 रुपये प्रति किलोमीटर का भुगतान करेगी।”
अब आप कहेंगे, “वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। जब बस वाले को किलोमीटर के हिसाब से पैसा मिलेगा, तो वह सवारी के लिए धक्का-मुक्की नहीं करेगा।”
पर ठहरिए! आप भारत के प्रशासनिक ज्ञान को कम आंक रहे हैं। जब सरकार किलोमीटर के हिसाब से पैसा देगी, तो बस वाला सवारी बैठाने के बजाय खाली बस को हाईवे पर दौड़ाएगा ताकि किलोमीटर का मीटर तेजी से घूमे! और उधर, जहाँ वास्तव में गांव के गरीब किसान को बस की जरूरत है, वहां कागजों में लिखा जाएगा—”मार्ग नंबर 404: बस सफलता पूर्वक संचालित हुई, परंतु कोहरे के कारण यात्री शून्य रहे!”
‘दस परसेंट’ का दर्द और हड़ताल
इस पूरी व्यवस्था से सबसे ज्यादा हाहाकार मचा है पुराने, छोटे बस ऑपरेटरों में। सागर, रतलाम, इंदौर और रीवा के बस मालिकों ने सिर मुंडवा लिए हैं। वे चिल्ला रहे हैं, “साहब, पहले हम 12 परसेंट टैक्स देते थे, अब आपने टैक्स बढ़ाकर 18 परसेंट कर दिया। ऊपर से आप कहते हो कि जो टिकट हम काटेंगे, उसका 10 परसेंट हिस्सा आपकी उस नई नवेली कंपनी को दें जो केवल दफ्तर में बैठकर पंखा झलती है!”
बस मालिकों की पीड़ा जायज है। एक छोटे बस मालिक ने कहा, “पहले तो हमें केवल आरटीओ (RTO) बाबू और चौराहे के हवलदार को चढ़ावा देना पड़ता था। अब हमें कॉर्पोरेट स्टाइल में ‘डिजिटल चंदा’ देना पड़ेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले रसीद नहीं मिलती थी, अब रसीद पर ‘सुगम परिवहन विकास शुल्क’ लिखा होगा!”
इसी आक्रोश में पूरे प्रदेश के बस मालिकों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल का झंडा बुलंद कर दिया है।
लेकिन सरकार मुस्कुरा रही है। सरकार जानती है कि हड़ताल तो दो दिन चलेगी, फिर जब पेट की आंतें पीठ से चिपकेंगी, तो बस मालिक भी इसी ’10 परसेंट’ के अनुशासन में आ जाएंगे।
भ्रष्टाचार के आधुनिक और जगमगाते ‘मॉडल’
पुराने जमाने का भ्रष्टाचार बहुत फूहड़ होता था। कोई क्लर्क किसी फाइल के नीचे पचास का नोट दबा लेता था, या चेकिंग इंस्पेक्टर बस रोककर सौ रुपये ले लेता था। उसमें कोई ‘डिजिटल इंडिया’ नहीं था।
लेकिन इस नई ‘सुगम योजना’ में भ्रष्टाचार ने थ्री-पीस सूट पहन लिया है:
- रूटों की मलाईदार नीलामी: भोपाल-इंदौर या जबलपुर-इंदौर जैसे मलाईदार और भरपूर सवारी वाले रूट उन बड़ी कंपनियों को मिलेंगे जिनकी पहुंच ‘ऊपर’ तक है। और जो बेचारा छोटा ऑपरेटर है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से एक बस खरीदी है, उसे मिलेगा ‘रीवा से चुरहट वाया जंगल’ वाला रूट, जहां दिन में चार सवारियां और छह बकरियां बैठती हैं।
- जीपीएस और किलोमीटर का खेल: ‘ग्रॉस कॉस्ट मॉडल’ में सबसे बड़ा खेल होता है ‘फर्जी किलोमीटर’ का। बस डिपो में खड़ी रहेगी, लेकिन जीपीएस डिवाइस को किसी मोटरसाइकिल पर बांधकर 50 किलोमीटर घुमा दिया जाएगा। कागजों में बस चल जाएगी, ठेकेदार को 50 किमी का भुगतान हो जाएगा, और अफसर के घर में नया एसी लग जाएगा।
- ई–बस की चार्जिंग का धर्मार्थ कार्य: ‘पीएम-ईबस सेवा’ के तहत केंद्र सरकार इलेक्ट्रिक बसों के लिए पैसा दे रही है। पर ई-बस के लिए जो चार्जिंग स्टेशन और बिजली के भारी-भरकम ट्रांसफॉर्मर लगेंगे, उनके ठेके किसे मिलेंगे? जाहिर है, वे ठेके किसी मंत्री जी के भांजे या साले की ‘ग्रीन एनर्जी’ कंपनी को ही मिलेंगे।
६. जनता के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा?
आइए, इस पूरी जलेबी को जरा निष्पक्षता से छानकर देखें कि इसमें जनता का क्या शीरा है और क्या तेल।
जनता के लिए क्या ‘अच्छा’ है (या दिखाया जा रहा है):
- नई गाड़ियां और सुरक्षा: पुरानी 15 साल पुरानी खटारा बसों की जगह अगर नई, एसी और इलेक्ट्रिक बसें आती हैं, तो यात्री की कमर टूटने से बचेगी।
- सीसीटीवी और पैनिक बटन: महिला यात्रियों के लिए सुरक्षा का एक कागजी और तकनीकी कवच मिलेगा।
- डिजिटल टिकटिंग: कंडक्टर अब “छुट्टे पैसे नहीं हैं” कहकर दो रुपये हड़प नहीं पाएगा। आपको मोबाइल ऐप से ऑनलाइन टिकट मिलेगा।
जनता के लिए क्या ‘बुरा’ है:
- किराए में गुप्त वृद्धि: सेवा ‘सुगम’ और ‘हाईटेक’ होगी, तो किराया भी तो ‘हाईटेक’ होगा। जहां पहले आम आदमी 1.25 रुपये प्रति किलोमीटर में सफर करता था, अब उसे ‘सुविधा शुल्क’ मिलाकर 1.75 रुपये देने होंगे।
- ग्रामीण इलाकों की अनदेखी: जब निजी कंपनियां केवल मुनाफे के लिए आएंगी, तो वे उन अंदरूनी गांवों में जाना बंद कर देंगी जहां से उन्हें पूरी सवारियां नहीं मिलतीं। परिणाम? गांव का गरीब फिर से पिकअप गाड़ियों और ट्रॉलियों में भेड़ों की तरह ठंसकर जाने को मजबूर होगा।
- हड़ताल का दंश: जब-जब सरकार और बस मालिकों की कुश्ती होगी, तब-तब स्टेशन पर सूटकेस लिए आम नागरिक ही सिर धुनता नजर आएगा।
क्या सरकार वाकई मदद कर रही है या सिर्फ कमाई?
यह सवाल ही बुनियादी रूप से गलत है। सरकार कोई ‘चैरिटी ट्रस्ट’ नहीं है कि वह केवल आपकी मदद करने के लिए रात-दिन जाग रही है। आधुनिक कल्याणकारी राज्य का सबसे बड़ा सिद्धांत है, “जनता का भला इस तरह करो कि अपने अपनों का भला पहले हो जाए!”
अगर सरकार को केवल जनता की चिंता होती, तो वह 20 साल पहले बंद किए गए अपने राज्य परिवहन निगम (MPSRTC) को दोबारा जीवित करती। वह खुद बसें खरीदती, खुद ड्राइवरों को पक्की सरकारी नौकरी देती और न्यूनतम किराए में जनता को सेवा देती।
परंतु सरकार ने वह रास्ता नहीं चुना। उसने रास्ता चुना—’नियामक’ (Regulator) बनने का। यानी, बसें कोई और चलाए, डीजल कोई और भराए, और हम बीच में बैठकर केवल ‘परमिट’ और ‘रॉयल्टी’ का टैक्स वसूलें। यह मदद करने का तरीका नहीं है, यह तो चुंगी नाका लगाने का आधुनिक, डिजिटल और कॉर्पोरेट तरीका है!
तो फिर विकल्प क्या है? (सरकार क्या कर सकती थी)
अगर नीयत वाकई साफ हो और मकसद सिर्फ भ्रष्टाचार मिटाकर जनता को सस्ती, सुरक्षित यात्रा देना हो, तो इसके कई वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं:
- बस ऑपरेटरों की सहकारी समितियां (Cooperatives): बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को सात अंचलों की ठेकेदारी देने के बजाय, छोटे-छोटे बस मालिकों की सहकारी समितियां बनाई जाएं। उन्हें आसान किश्तों पर नई और ई-बसे खरीदने के लिए सरकारी लोन दिया जाए। इससे स्थानीय रोजगार बचेगा और एकाधिकार (Monopoly) भी नहीं बनेगा।
- प्रत्यक्ष जीसीसी मॉडल (बिना बीच की बिचौलिया कंपनियों के): सरकार सीधे बस मालिक से अनुबंध (Contract) करे। यह बीच में जो ‘10% कट’ खाने वाली सात नई क्षेत्रीय कंपनियां बनाई गई हैं, इनकी क्या जरूरत है? यह तो केवल सफेद हाथियों को पालने जैसा है।
- पारदर्शी ‘ओपन डेटा’ पोर्टल: हर बस का जीपीएस डेटा, उसका डेली किलोमीटर रन, और उसे हुआ भुगतान सरकारी वेबसाइट पर जनता के देखने के लिए सार्वजनिक (Open Source) कर दिया जाए। जब आम नागरिक देख सकेगा कि कौन सी बस वास्तव में चली और कौन सी केवल कागजों पर दौड़ी, तो भ्रष्टाचार अपने आप आधा रह जाएगा।
- स्क्रैपेज बोनस और ग्रीन सब्सिडी: 15 साल पुरानी बसों को जबरन जब्त करने के बजाय, छोटे बस मालिकों को पुरानी बस जमा करने पर नई इलेक्ट्रिक या बीएस-6 बस खरीदने के लिए भारी सब्सिडी और आसान कर्ज दिया जाए।
अंतिम बात: आम नागरिक की ‘बस’ यात्रा
अंत में, बात फिर वहीं आकर टिकती है जहां से शुरू हुई थी।
मध्य प्रदेश का आम नागरिक स्टैंड पर खड़ा है। उसके एक हाथ में झोला है, दूसरे हाथ में बच्चे का हाथ। सामने से एक चमचमाती नीली बस आ रही है, जिस पर लिखा है—’मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’।
नागरिक खुश होता है कि चलो, एसी बस आ गई! वह अंदर बैठता है। थोड़ी देर में कंडक्टर आता है और किराए का जो टिकट काटता है, वह उसके पुराने बजट से 30% ज्यादा है। नागरिक सोचता है, “किराया तो बढ़ गया, पर शायद सफर आरामदायक होगा।”
अचानक बस एक गड्ढे में गिरती है, कांच खड़खड़ाते हैं, और जीपीएस की स्क्रीन पर लिखा आता है, ‘आपकी यात्रा सुगम और सुरक्षित है!’
नागरिक खिड़की से बाहर थूकता है और मन ही मन कहता है—”बस बदल गई, टिकट का रंग बदल गया, दलाल का नाम ‘कंपनी’ हो गया… पर मेरी रीढ़ की हड्डी आज भी उसी गड्ढे में टूट रही है, जिसमें बीस साल पहले टूटती थी!”
यही हमारे समय का गद्य है, यही हमारी राजनीति का पद्य है, और यही ‘सुगम परिवहन’ का असली सत्य है।
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