— विजय मिश्रा
हमारे देश में जब भी कोई नया ईंट-गारे का ढांचा खड़ा होता है, तो उसका सबसे पहला काम जनता की सेवा करना नहीं, बल्कि नेताओं की वरिष्ठता और उनकी अहं-तुष्टि का माप-तौल करना होता है। ईंटें बाद में जुड़ती हैं, पहले इंसानी रिश्तों और शिष्टाचार के प्लास्टर उखड़ने लगते हैं।
हाल ही में त्योंथर तहसील के नए-नवेले भवन की ओपनिंग का भव्य उत्सव संपन्न हुआ। मंच पर वर्तमान विधायक सिद्धार्थ तिवारी, सांसद जनार्दन मिश्रा और रीवा के कलेक्टर साहब सहित समूचा प्रशासनिक अमला शोभा बढ़ा रहा था। लेकिन लोकतंत्र के इस नए मंदिर की देहरी पर एक दृश्य ऐसा घटा, जिसने भारतीय राजनीति के सदियों पुराने ‘सम्मान-शास्त्र’ को मंच के नीचे ला पटका। पूर्व विधायक श्यामलाल द्विवेदी जी न्यौते और आरक्षित सीट के अभाव में आहत दिखे और जनता के सामने ही अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी।
विंध्य की माटी में दो बुनियादी बातें हमेशा से सिखाई जाती रही हैं—पहला, बुजुर्गों को आदर देना और दूसरा, अपनों से छोटों की चूक पर बड़ों का बड़प्पन दिखाते हुए माफ कर देना। पर राजनीति एक ऐसा रासायनिक पदार्थ है, जो इन दोनों मर्यादाओं का तेजी से वाष्पीकरण कर देता है।
इस पूरे घटनाक्रम में जो बात राहत देती है, वह यह कि उम्र में छोटे और वर्तमान विधायक सिद्धार्थ तिवारी ने अपनी मर्यादा नहीं लांघी। जब सामने से आक्रोश की आंधी चल रही थी, तब वे चुपचाप अपना काम करते रहे और किसी प्रकार की तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। राजनीति में उकसावे के सामने चुप्पी साध लेना कमजोरी नहीं, बल्कि संयम का वह स्वागत योग्य लक्षण है जो आज के दौर में दुर्लभ होता जा रहा है।
रही बात हमारे सांसद जनार्दन मिश्रा जी की, तो वे एक परिपक्व और राजनीतिक रूप से मझे हुए नेता माने जाते हैं। जिस कलात्मक और आक्रामक अंदाज में वे मंचों से विपक्ष पर चाबुक चलाते हैं, वैसी ही कड़क अनुशासन-संहिता उन्हें अपनी पार्टी के भीतर भी लागू करनी चाहिए। शुक्ला जी जैसे एकाध गिने-चुने नेताओं को छोड़ दें, तो सांसद जी के पास वह राजनीतिक हैसियत और वजन है कि वे किसी भी विधायक या पूर्व विधायक को सही राह दिखा सकें। यदि दल के भीतर कोई रोज-रोज नाटक खड़ा करे, तो उसे बुलाकर पार्टी की गरिमा और पॉलिसी का पाठ पढ़ाना सांसद जी की प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है।
लेकिन इस पूरे तमाशे में सबसे बड़ा और असली अपराधी कोई और ही है—वह है हमारा सरकारी प्रशासन। प्रशासनिक अधिकारियों को नेताओं की मर्जी, व्यक्तिगत गुटबाजी और हवा के रुख के हिसाब से नहीं, बल्कि तय सरकारी प्रोटोकॉल और नियमों के तहत काम करना चाहिए। जब भी कोई सरकारी आयोजन हो, तो प्रशासनिक अफसरों की फाइल में नियम हावी होने चाहिए, न कि किसी खास नेता की नाराजगी या पसंद-नापसंद। यदि प्रशासनिक मशीनरी रीढ़ सीधी रखकर काम करे, तो आधे से ज्यादा मंच-विवाद वहीं दम तोड़ दें।
वैसे, एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि श्रेय देने में इतनी हिचक क्यों?
राजनीति में जो कल विधायक या मंत्री थे, वे आज साधारण नागरिक हैं; जो आज पावर में हैं, कल वे भी पूर्व हो जाएंगे। पार्टियां तो आती-जाती रहेंगी, लेकिन विकास के काम वहीं टिके रहते हैं। यदि पूर्व विधायक ने अपने कार्यकाल में क्षेत्र के लिए काम करवाया था, तो उसका श्रेय देने में किसी का क्या घट जाता?
चाहे त्योंथर का 100 बिस्तरों का अस्पताल हो, तहसील भवन हो, पीएम श्री / सीएम राइज (संदीपनी) स्कूल हो, या फिर ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण हो—ये सब जनता के हित के काम हैं। सोहगी से बुदामा मार्ग पर मझिगवां पुल सहित विभिन्न पुल-पुलियों का निर्माण ही देख लीजिए; कभी बारिश के दिनों में यह रास्ता हफ्तों बंद रहता था और सैकड़ों गांवों का कटनी-संपर्क टूट जाता था। आज वहां निर्बाध आवाजाही है। अमांव से बरा तक की सड़क पहली बार डामर की बनी, जिससे हजारों लोगों का जीवन सुगम हुआ। इन जनहित के कार्यों को नकारना इतिहास से आंखें मूंदने जैसा है।
आखिर राजनीति और समाज सेवा के इस कटीले रास्ते पर अधिकांश लोग आते ही इसीलिए हैं कि जब वे कोई अच्छा काम छोड़ जाएं, तो समाज उनके योगदान को याद रखे और उनकी सराहना करे।
जो लोग आज राजनीति के केंद्र में हैं, उनके पास इतिहास रचने का बहुत बड़ा कैनवास है। वे चाहें तो अपने ठोस और टिकाऊ कामों के जरिए अपना नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज करा सकते हैं। फीते तो रोज कटेंगे और पट्टियों पर नाम रोज बदलेंगे, लेकिन जनता के दिलों पर उकेरा गया विकास का नाम कभी नहीं मिटता।
अंत में, हमारी प्रशासनिक मशीनरी के लिए सीधे तौर पर कहूँगा कि “तहसील भवन या कोई भी सरकारी इमारत जनता के टैक्स के पैसों से बनती है, किसी नेता या पार्टी की जेब के पैसों से नहीं कि वहां सिर्फ उनकी मर्जी का हुकूम चले और क्षेत्र का भला करने वाले नायकों का ही पत्ता साफ कर दिया जाए। अफसरों का असली काम नेताओं की जी-हुज़ूरी करना नहीं, बल्कि जनता के लिए काम करने वाले सच्चे नायकों का सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकारी कार्यक्रमों का संचालन प्रशासनिक प्रोटोकॉल से होना चाहिए, न कि किसी की निजी पसंद-नापसंद से। अधिकारी खुद आगे बढ़कर योग्य लोगों को आमंत्रित करें और नियमों की मर्यादा कायम रखें। यदि अफसर रीढ़ सीधी करके काम करेंगे, तो न किसी का अहंकार फूलेगा और न ही लोकतंत्र का कोई भी फीता किसी जनसेवक के स्वाभिमान को जख्मी करेगा।



