मैंने यह लेख क्यों लिखा?
आजकल अख़बार और टीवी खोलिए, तो ऐसा लगता है कि देश में अपराध की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रसोईघर और शयनकक्ष के बीच कहीं खुल गई है। कभी नीले ड्रम में पति का शव मिलता है, कभी प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की कहानी सामने आती है, तो कभी अवैध संबंधों की आग में पूरा परिवार जल जाता है। हत्या के तरीक़े अलग-अलग हैं, कहानी के पात्र अलग हैं, लेकिन कई मामलों में पटकथा के केंद्र में एक ही पुराना किरदार दिखाई देता है—विवाहेतर संबंध (Extra Marital Affairs)। हालाँकि हर अपराध की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं और हर विवाहेतर संबंध हत्या तक नहीं पहुँचता, फिर भी ऐसी घटनाएँ एक असहज सवाल ज़रूर खड़ा करती हैं: आख़िर हमारे रिश्तों में ऐसा क्या बदल रहा है कि साथ जीने की कसमें खाने वाले लोग कभी-कभी एक-दूसरे की जान लेने तक पहुँच जाते हैं?
यह सवाल मेरे मन में कुछ ज़्यादा ही देर तक ठहरा। मैंने सोचा, आख़िर यह संकट है क्या? क्या प्रेम कम हो गया है, संयम समाप्त हो गया है, या मनुष्य के पास विकल्प इतने बढ़ गए हैं कि अब किसी एक रिश्ते के प्रति ज़िम्मेदार बने रहना उसे अपनी स्वतंत्रता पर हमला लगने लगा है? और फिर ध्यान गया मिलेनियल पीढ़ी पर, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच अपना वैवाहिक जीवन सँभाल रही है। इस पीढ़ी ने एक ओर माता-पिता से विवाह की स्थिरता का आदर्श लिया, दूसरी ओर आधुनिक जीवन से व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आकांक्षा। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि इन दोनों के बीच संतुलन बनाने के बजाय उसने दोनों की सुविधाएँ तो चुन लीं, ज़िम्मेदारियाँ चुनने में थोड़ी देर कर दी।
जेन-ज़ी की कहानी तो और दिलचस्प है। इस पीढ़ी के अनेक युवाओं के लिए विवाह अब सात जन्मों का अटूट बंधन नहीं, बल्कि ऐसा समझौता है जिसकी शर्तें पहले से पढ़ लेना ज़रूरी है। रिश्ते में प्रवेश करने से पहले ही बाहर निकलने का रास्ता तलाश लिया जाता है। एक साथी के रहते दूसरे विकल्प खुले रखना आधुनिक समझदारी है या भावनात्मक असुरक्षा, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन जब रिश्ते में एक व्यक्ति दूसरे को जीवनसाथी से अधिक बैकअप समझने लगे, तब प्रेम की जगह प्रबंधन और विश्वास की जगह हिसाब-किताब ले लेता है। विवाह फिर दो लोगों का साथ नहीं रह जाता, वह ऐसी नौकरी बन जाता है जिसमें कर्मचारी नियुक्ति-पत्र पर हस्ताक्षर करते समय ही दूसरी कंपनी के इंटरव्यू की तैयारी कर रहा होता है।
इन्हीं विचारों के बीच मेरे दिमाग़ की बत्ती जली। मैंने अपने दादा-दादी, नाना-नानी और माता-पिता की पीढ़ी की ओर देखा। उनके बीच मतभेद कम नहीं थे। कभी विचारों के, कभी स्वभाव के, कभी पैसों के, कभी सास-बहू के, तो कभी उन बर्तनों के, जिनकी खनक में आधी सदी का पारिवारिक इतिहास छिपा होता था। वे एक-दूसरे पर चिल्लाते थे, रूठते थे, शिकायतें पालते थे और कई बार एक-दूसरे की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करते थे। फिर भी, उम्र के आख़िरी पड़ाव तक पहुँचते-पहुँचते, जब घुटनों ने जवाब दे दिया, आँखों ने धुँधला देखना शुरू कर दिया और आवाज़ में पहले जैसी ताक़त नहीं बची, तब भी वे अक्सर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे।
आख़िर ऐसा क्या था जो उन्हें बाँधे रखता था? प्रेम? संस्कार? ज़िम्मेदारी? आर्थिक निर्भरता? समाज का डर? बच्चों का भविष्य? या फिर इतने वर्षों तक एक ही व्यक्ति के साथ रहते-रहते उसकी आदत पड़ जाना, ठीक वैसे ही जैसे पुराने तकिए की सिलवटों से भी आदमी को मोह हो जाता है? सच शायद इन सबके बीच कहीं था। उनकी स्थिरता में समर्पण भी था, लेकिन मजबूरी भी; अपनापन भी था, लेकिन सामाजिक दबाव भी। इसलिए उनकी लंबी शादियों को केवल आदर्श कहना उतना ही अधूरा होगा, जितना उन्हें केवल समझौता कहकर ख़ारिज कर देना।
इसके विपरीत, आज के कुछ रिश्तों में बेवफ़ाई के लिए किसी बड़े संकट की नहीं, एक छोटे-से बहाने की ज़रूरत दिखाई देती है। कहीं भावनात्मक दूरी है, कहीं शारीरिक आकर्षण का नया अवसर, कहीं सोशल मीडिया पर मिला कोई नया चेहरा, तो कहीं यह विश्वास कि अगर एक रिश्ता नहीं चला, तो दूसरा मिल जाएगा। समस्या यह नहीं कि आज हर युवा बेवफ़ा है या हर पुराना दंपती वफ़ादार था। ऐसा मानना दोनों पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। समस्या यह है कि क्या हमने रिश्तों को निभाने की कला खो दी है, या पहली बार यह समझना शुरू किया है कि निभाने और घुटते रहने में फ़र्क़ होता है?
और यहीं से मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल पैदा हुआ—अगर आज के रिश्ते जवानी की उत्तेजना, मध्य आयु के आकर्षण और सुविधानुसार बदलते विकल्पों के बीच ही दम तोड़ने लगेंगे, तो बुढ़ापे में उनका सहारा कौन बनेगा?
जब शरीर जवाब देने लगेगा, जब रात को दवा के लिए पानी चाहिए होगा, जब अस्पताल के कमरे में किसी परिचित हाथ की तलाश होगी, जब बच्चों के पास समय कम और दूरियाँ ज़्यादा होंगी, तब क्या कोई पुराना साथी पास बैठेगा? या फिर एक स्मार्टफ़ोन, एक AI Robot और एक सुंदर-सा वृद्धाश्रम (Old Age Home) उस भावनात्मक ख़ालीपन की भरपाई करेंगे, जिसे हमने अपनी जवानी में मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया था?
इसी प्रश्न ने मुझे तीन पीढ़ियों के वैवाहिक जीवन, उनके प्रेम, उनकी बेवफ़ाई, उनके समझौतों और उनके संभावित बुढ़ापे पर लिखने के लिए प्रेरित किया। यह लेख पुरानी पीढ़ी को संत और नई पीढ़ी को अपराधी घोषित करने के लिए नहीं है। न ही इसका उद्देश्य विवाह को हर हाल में बचाए रखने का उपदेश देना है। इसका उद्देश्य केवल यह समझना है कि एक रिश्ता आख़िर किस आधार पर टिकता है—सात फेरों पर, सामाजिक मजबूरी पर, शारीरिक आकर्षण पर, आर्थिक सुरक्षा पर, या उस छोटे-से भरोसे पर कि कल जब तुम कमज़ोर पड़ोगे, तब भी मैं तुम्हारे लिए पानी का गिलास लेकर आऊँगा।
क्योंकि सात जन्मों की गारंटी देना आसान है; इस एक जन्म के बुढ़ापे की वारंटी निभाना मुश्किल।
चलिए फिर बिना समय गवाएं शुरू करते हैं।
(Journalist Vijay Mishra-शैली में पूर्व-मिलेनियल, मिलेनियल और जेन-जी के बुढ़ापे का अध्ययन)
विवाह का रेंट एग्रीमेंट और मेरी चिंता
मेरे एक मित्र कहते हैं कि प्यार अंधा होता है, पर शादी के बाद उसे आँखें मिल जाती हैं। मैंने उनसे कहा कि आँखें मिल जाने के बाद आदमी पछताता भी तो होगा? वे बोले, पछताने के लिए भी फुर्सत चाहिए, और शादीशुदा आदमी को फुर्सत सिर्फ़ तब मिलती है जब पत्नी मायके गई हो। तब वह पछताता नहीं, पिक्चर देखता है।
मित्र की बात में दम है, पर वे पुरानी पीढ़ी के आदमी हैं। नई पीढ़ी के पास आँखें पहले से हैं, और चश्मे भी। वह शादी से पहले ही दस चश्मे बदल चुकी होती है। कभी इंस्टाग्राम का गुलाबी चश्मा, कभी डेटिंग ऐप का रंगीन चश्मा। बस एक चीज़ नहीं बदलती, जिसे वह चश्मा लगाकर देख रही है, यानी अपना ही चेहरा।
आज के समाज में विवाह की स्थिति यह हो गई है कि वह सात जन्मों का बंधन नहीं, फ्लैट का रेंट एग्रीमेंट लगने लगा है। ग्यारह महीने का करार, रिन्यू करना हो तो पुनर्विचार, और छोड़ना हो तो केवल एक महीने का नोटिस। कुछ समझदार लोग तो ब्रोकर की तरह पहले ही पूछ लेते हैं, “जी, साइट विज़िट करके देख लें? पार्किंग-वार्किंग, पानी की सप्लाई?” पुराने ज़माने में माँ-बाप लड़की देखने जाते थे, अब लड़की स्वयं लड़के का ‘पैकेज’ देखती है। दोनों पक्ष बराबर हैं, यह बात अलग है कि दोनों पक्ष बराबर घाटे में रहते हैं।
इस विषय पर मैं कुछ लिखने बैठा हूँ, तो पाठक यह न समझें कि मैं कोई संत हूँ। मैं भी उसी समाज का नागरिक हूँ जो दूसरों को चरित्र का प्रवचन देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है और अपने चरित्र का ऑडिट कराने से वैसे ही डरता है जैसे दफ़्तर का बाबू इनकम टैक्स वाले से। फिर भी लिखूँगा, क्योंकि इस देश में जिसके पास कलम हो, उसके पास दूसरों को सुधारने का लाइसेंस अपने आप आ जाता है। सुधारने की यह सुविधा इतनी सस्ती है कि देश में सुधारकों की संख्या सुधरने वालों से हमेशा ज़्यादा रही है। यही कारण है कि समाज सुधरता कम है, सुधारकों की जमात बढ़ती जाती है।
तो आइए, तीन पीढ़ियों का बुढ़ापा देखें। एक जो बूढ़ी हो चुकी, एक जो बूढ़ी हो रही है, और एक जो अभी बूढ़ी होने के बारे में सोचने से भी पहले यह सोच रही है कि आज रात का ‘डेट’ कहाँ होगा। और इस पूरी यात्रा में हम ईमानदारी से यह भी देखेंगे कि जो पीढ़ी हमें आदर्श बताई जा रही है, वह कितनी आदर्श थी, और जो हमें अपराधी बताई जा रही है, वह कितनी अपराधी है।
पूर्व-मिलेनियल युग, जिसमें कलह भी एक संस्कार था
अपने दादा-दादी या नाना-नानी का दांपत्य देखिए। सुनते हैं कि वहाँ एक अद्भुत मौन होता था। वे प्रेम का इज़हार करने के लिए न वैलेंटाइन डे का इंतज़ार करते थे, न इंस्टाग्राम रील की। उनके यहाँ प्रेम का प्रदर्शन इतना कम था कि कभी-कभी प्रेम स्वयं संदेह करने लगता था कि मैं इस घर में हूँ भी या नहीं।
शाम का समय है। पुराने बरामदे में दो लकड़ी की कुर्सियाँ आमने-सामने पड़ी हैं। एक पर दादाजी बैठे हैं, दूसरी पर दादीजी। दोनों के बीच संवाद लगभग शून्य है। दादाजी अख़बार पढ़ रहे हैं, जो सुबह से तीसरी बार पढ़ा जा रहा है, क्योंकि चौथी बार पढ़ने का मतलब होगा दादीजी से बात करना। दादीजी स्वेटर बुन रही हैं, जो किसी के लिए नहीं है, बस इसलिए कि हाथ चलते रहें और मुँह बंद रहे।
पर आप कहेंगे कि मौन कितना गहरा था! मैं कहूँगा कि हाँ, बहुत गहरा था, इतना कि उसमें पचास साल की शिकायतें दफ़न थीं।
दादीजी की आँखें कमज़ोर हो गई हैं, तो उनका चश्मा ढूँढकर नाक पर टिका देना दादाजी का रोज़ का कर्तव्य है। यह दृश्य बड़ा मार्मिक है। लेकिन ज़रा रुकिए। चश्मा ढूँढना कर्तव्य इसलिए बन गया क्योंकि दादीजी हर रोज़ उसे कहीं न कहीं रखकर भूल जाती हैं, और दादाजी हर रोज़ यह बात इतने ऊँचे स्वर में बताते हैं कि मोहल्ले को पता चल जाए कि इस घर में अब भी एक आदमी है जिसे सब याद रहता है। उधर दादाजी के घुटनों में गठिया है, तो दादीजी गुनगुने तेल से मालिश कर देती हैं, बिना वेतन के। मालिश के दौरान वे हर बार वही पुराना किस्सा दोहराती हैं कि सन् तिहत्तर में उनकी माँ ने जो बर्तन दिए थे, उन्हें दादाजी की बहन ने कैसे हड़प लिया। दादाजी पैर की चीख़ को घुटने के दर्द से जोड़कर सहन कर लेते हैं। इसे समाजशास्त्र में ‘सह-अस्तित्व’ कहते हैं। हम जैसे लोग इसे ‘दर्द का प्रबंधन’ कहेंगे।
इन पचास वर्षों में न जाने कितनी बार रसोई में थालियाँ खड़की होंगी, कितनी बार बात-बात पर पतीला पटका गया होगा। पर तलाक के कागज़ कभी नहीं बने। क्यों? हमें बताया जाता है कि उनके हृदय में एक शाश्वत सत्य स्थापित था कि जीवन का उद्देश्य एक-दूसरे का भार साझा करना है। मैं इस सत्य का सम्मान करता हूँ, पर यह भी जानता हूँ कि उसी हृदय में एक और सत्य भी स्थापित था, कि तलाक के बाद लोग क्या कहेंगे, और मायके में दो भाभियाँ पहले से बैठी हैं, जिनकी रसोई में एक और थाली पोसने का मन नहीं है। संतोष बहुत बार चरित्र नहीं, मजबूरी का शुद्ध रूप होता है। जैसे जेल में बंद आदमी भी बहुत शांत रहता है, तो हम उसकी शांति पर निबंध नहीं लिखते।
फिर भी मैं मानता हूँ कि उस पीढ़ी में कुछ बात थी। उसने जवानी में ही यह स्वीकार कर लिया था कि इस संसार में कोई मनुष्य निर्दोष नहीं होता। पति क्रोधी हो सकता है, पत्नी बातूनी हो सकती है, और दोनों एक-दूसरे को सुधारने का प्रयास करते-करते अंत में केवल एक-दूसरे को सहन करना सीख जाते हैं। यह सीखना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। आज की पीढ़ी सुधारने से पहले ही रिपोर्ट कर देती है, ‘यह व्यक्ति टॉक्सिक है।’ पुरानी पीढ़ी में न कोई टॉक्सिक था, न कोई हीलिंग कराता था। सब अपने-अपने ज़हर के साथ जीते थे और धीरे-धीरे उसके अभ्यस्त हो जाते थे, जैसे शिव ने नीलकंठ बनकर किया, फ़र्क बस इतना कि शिव को इसका श्रेय मिला, इन्हें नहीं।
जब जवानी का ज्वार उतरा, चेहरे पर झुर्रियों का नक्शा बना और बालों पर चाँदी चढ़ गई, तब उन्हें समझ आया कि रूप-रंग और यौवन का मद एक क्षणिक छलावा था। जो बचा, वह था संस्कार, भरोसा और एक अजीब-सी आत्मीयता। यहाँ मैं एक बात जोड़ना चाहूँगा, जो नैतिकता के ठेकेदार नहीं जोड़ते। जो बचा, उसका एक बड़ा हिस्सा यह भी था कि इतने साल एक ही छत के नीचे रहते-रहते आदमी दूसरे के खर्राटों का भी भक्त हो जाता है। खर्राटे की आवाज़ बंद हो जाए तो नींद नहीं आती। यही तो असली प्रेम है, जिसमें आदमी को अपने दुख की आदत पड़ जाती है।
उनके बुढ़ापे के क्षितिज पर अकेलेपन का भय नहीं मंडराता था, क्योंकि घर में बेटे थे, बहुएँ थीं, पोते-पोतियाँ थे। अंतिम साँस लेते समय सिर रखने के लिए कंधा उपलब्ध था। कंधा तो वैसे सदा उपलब्ध रहा, पर बहुओं से पूछिए कि उस कंधे के नीचे कौन दबा था। परंपरा ने बुढ़ापा सुरक्षित बनाया, यह सच है। पर परंपरा ने बहुत-सी बहुओं की जवानी की बलि भी ली। जो पीढ़ी आज बूढ़ी होकर शान से कह रही है कि हमने कभी तलाक नहीं लिया, उसे यह भी सोचना चाहिए कि तलाक न लेने की सुविधा हर किसी को कहाँ मिली थी। कुछ लोग तो इसीलिए सात जन्म निभाते रहे कि उन्हें पहले ही जन्म में एक भी विकल्प नहीं दिया गया था।
तो यह थी पूर्व-मिलेनियल पीढ़ी, जिसके दांपत्य में प्रेम कम था, पर पक्का मकान था; संवाद कम था, पर भरा-पूरा परिवार था; और स्वतंत्रता नहीं थी, पर बुढ़ापे की पेंशन थी। इसे आप आदर्श मानें या समझौता, यह आपकी मर्ज़ी। पर यह तय है कि इस पीढ़ी के बुढ़ापे में कोई अकेला नहीं मरा। कई बार तो इतने लोग घेरकर खड़े रहे कि बेचारे को चैन से मरने की भी जगह नहीं मिली।
मिलेनियल पीढ़ी, जो चालीस में संकट में थी और साठ में कैद है
अब ज़रा उस पीढ़ी को देखिए जो दूरदर्शन की चित्रहार से शुरू होकर पाँच-जी तक पहुँची और जिसने बीच के सफ़र में सिर्फ़ एक चीज़ नहीं छोड़ी, वह है ईएमआई। इस पीढ़ी का जन्म कर्ज़ लेने के लिए हुआ था और कर्ज़ का नाम बदलकर ‘निवेश’ रख देने में इसने वही प्रतिभा दिखाई जो हमारे नेताओं ने भ्रष्टाचार का नाम ‘सुविधा शुल्क’ रखने में दिखाई थी।
साठ साल की उम्र में इस पीढ़ी के पति-पत्नी किसी महानगर की गेटेड सोसायटी के एयर-कंडीशंड फ्लैट में रहते होंगे। फ्लैट में सब कुछ है। रोबोट झाड़ू लगाता है, अलेक्सा गाने सुनाती है, स्मार्ट टीवी पूछता है कि आप अब भी देख रहे हैं या सो गए। बस एक चीज़ नहीं है, जिसके बिना बाकी सब चीज़ें अलमारी में रखे बीमा के कागज़ जैसी हैं, यानी आदमी की आवाज़। टीवी का यह सवाल सबसे ज़्यादा चुभता है, क्योंकि पूरे घर में केवल वही है जो इन दोनों से पूछता है कि आप जाग रहे हैं या नहीं।
दोनों के शरीर में बीमारियों के सायरन बज रहे हैं। मधुमेह है, रक्तचाप है, रीढ़ की हड्डी है। इतने रोग लेकर जीना भी एक हुनर है, जिसे मिलेनियल ने अपनी नौकरी की तरह सीखा है। डॉक्टर कहता है नमक कम खाइए, चीनी कम खाइए, तनाव कम लीजिए। पूछिए कि भाई, यह तीनों चीज़ें छोड़ने के बाद ज़िंदगी में बचता क्या है, तो डॉक्टर नया टेस्ट लिख देता है। बच्चे लंदन, बर्लिन और टोरंटो में हैं। बच्चों की सफलता पर माता-पिता को वैसा ही गर्व है जैसा किसी बैंक को अपने भगोड़े कर्ज़दार की ऊँची कुर्सी पर होता है। गर्व बहुत है, वसूली कुछ नहीं। महीने में एक बार वीडियो कॉल आता है। कनेक्शन टूटता रहता है। मगर माता-पिता कहते हैं, कोई बात नहीं बेटा, हम सुन रहे हैं। जबकि सुन कुछ नहीं रहे होते, सिर्फ़ चेहरा देख रहे होते हैं, जैसे अस्पताल में ग्लूकोज़ की बूँद देखी जाती है।
अब आइए उन भूतों पर जो इस फ्लैट में रहते हैं। लेखक के अनुसार, यानी इस आलेख के मूल पाठ के अनुसार, मिलेनियल पति-पत्नी ने पैंतीस से पैंतालीस की उम्र के बीच ‘मिड-लाइफ क्राइसिस’ झेला था। यह क्राइसिस भी बड़ी उपयोगी चीज़ है। हमारे यहाँ पहले आदमी बिना क्राइसिस के बुरा बनता था, उसे अपराध-बोध भी होता था। अब बुरा बनने से पहले क्राइसिस आ जाता है और बुराई के बाद वह दवा का काम करता है। आदमी कह देता है कि मैं जीवन के अर्थ की तलाश में था, और तलाश में रास्ते में जो मिला, वह भी शामिल हो गया। मिड-लाइफ क्राइसिस इस तरह एक ऐसी चिकित्सा-पद्धति है जिसमें मरीज़ ही डॉक्टर है, मरीज़ ही बीमारी है और परचा भी वही लिखता है।
मेरे पड़ोस के एक सज्जन थे, जिनके पैतालीसवें साल में अचानक आत्मा जाग गई। आत्मा ने उनसे कहा, तुम्हें अपनी असली पहचान खोजनी चाहिए। वे असली पहचान खोजने दफ़्तर की एक सहकर्मी तक पहुँचे, जो अपनी असली पहचान उनसे पहले खोज चुकी थीं और उनकी पहचान ग़लत निकली। वे लौटे। पत्नी ने दरवाज़ा खोला और बिना कुछ कहे चाय बना दी। यही सबसे बड़ी सज़ा थी। जो पत्नी लड़ती है, उससे आदमी लड़कर निपट सकता है। जो पत्नी चुपचाप चाय बना दे, उससे निपटने की कला अब तक किसी विश्वविद्यालय में नहीं सिखाई गई। उस दिन के बाद वे दोनों एक छत के नीचे रहे, पर बीच में वह दीवार खड़ी हो गई जो ईंट की नहीं होती, इसलिए गिराई भी नहीं जा सकती।
तो साठ की उम्र में वे एक ही बिस्तर के दो कोनों में सोते हैं। बिस्तर इतना बड़ा है कि दोनों के बीच एक पूरा देश आ सकता है। रात को एक की सिसकी दूसरे को सुनाई देती है, पर वह चुपचाप करवट बदल लेता है, क्योंकि सहानुभूति दिखाने का मतलब बातचीत है और बातचीत का मतलब हिसाब, और हिसाब में दोनों के पास इतनी बड़ी-बड़ी रकमें हैं कि कोई खाता खोलना नहीं चाहता। मूल पाठ इसे ‘थकान भरा, घुटनयुक्त अकेलापन’ कहता है। मैं इसे एक पुराना, पक्का, किश्तों में चुकाया जाने वाला अकेलापन कहूँगा, जिसमें सबसे बड़ा ब्याज चुप्पी का है।
पर यहाँ मैं ईमानदारी से एक बात कहना चाहता हूँ, जो उपदेशक कभी नहीं कहते। यह जो साठ की उम्र का अकेलापन है, यह केवल मिलेनियल का आविष्कार नहीं है। पुराने बरामदे में बैठे जो दो लोग आपको मौन के देवता दिखाई देते थे, उनमें से कई का मौन भी यही था। फ़र्क यह है कि उनके यहाँ अकेलेपन को पूरा परिवार ढँक लेता था और मिलेनियल के यहाँ अकेलापन नंगा दिखता है, क्योंकि घर में परिवार के बदले केवल वाई-फ़ाई है। पुरानी पीढ़ी के दुख पर संयुक्त परिवार की चादर पड़ी थी, नई पीढ़ी के दुख पर चादर भी नहीं है। इसलिए जो पहले दिखता नहीं था, वह अब मुद्दा बन गया है। हमारे यहाँ दिखने वाली चीज़ें ही समस्या मानी जाती हैं। जो नहीं दिखता, उसे संस्कृति कहते हैं।
मिलेनियल को एक सुविधा ज़रूर है। उसके पास पछताने के लिए समय है और पछताने के लिए सामग्री भी। वह सोशल मीडिया पर देखता है कि उसकी जवानी का प्रेमी अब पाँच देशों की यात्रा करके पारिवारिक छुट्टियाँ मना रहा है, और अपनी बालकनी में बैठकर मुरझाए हुए तुलसी के पौधे को पानी देता है। तुलसी भी जानती है कि पानी डाला जा रहा है और जिसने डाला, वह पानी नहीं, पश्चाताप डाल रहा है। तुलसी मुरझा जाती है। मिलेनियल दंपत्ति इसे भी एक संकेत मानकर कोई नई थेरेपी करा लेता है। थेरेपिस्ट पूछता है कि आप ख़ुद को कैसे माफ़ करेंगे। वे कहते हैं, पहले एक-दूसरे को तो माफ़ कर दें। थेरेपिस्ट घड़ी देखकर कहता है, समय हो गया, अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे। इस तरह माफ़ी भी साप्ताहिक किश्तों में मिलती है, और अगली किश्त के पैसे अलग से लगते हैं।
Gen Z, जिनके हाथ में अँगूठा है और अँगूठे में भविष्य
अब जेन-जी की बारी है। यह वह पीढ़ी है जिसने स्वाइप का आविष्कार नहीं किया, पर उसे इतना कलात्मक बना दिया कि लोग उसे लोक-नृत्य की श्रेणी में रखने लगे हैं। दाएँ अँगूठे से पसंद, बाएँ अँगूठे से नापसंद। पुराने ज़माने में रिश्ता तय करने के लिए पंडित कुंडली मिलाता था, तीन दिन लगते थे और पंडित को दक्षिणा। अब एल्गोरिदम तीन सेकंड में मिला देता है और दक्षिणा विज्ञापन की शक्ल में किसी और को जाती है। विवाह-बाज़ार में बिचौलिए का धंधा कम नहीं हुआ, बस वह अब वर्दी की जगह वेंचर कैपिटल पहनता है।
मूल पाठ का आरोप है कि इस पीढ़ी के लिए ‘कमिटमेंट’ शब्द गाली है और ‘रेड फ्लैग’ सबसे बड़ा धार्मिक चिह्न। मैं इस आरोप को गंभीरता से लेता हूँ। मैंने एक नौजवान से पूछा कि भाई, तुम शादी से इतना घबराते क्यों हो? उसने कहा, अंकल, मैं घबराता नहीं, मैं विकल्प खुले रखता हूँ। मैंने कहा कि विकल्प खुले रखने का नतीजा यह होता है कि आदमी जीवन-भर दरवाज़े पर खड़ा रहता है, और जिसके पीछे हवा आती है, उसे जुकाम हो जाता है। उसने फ़ौरन मोबाइल निकाला और जुकाम का इलाज ढूँढ़ने लगा। यह उत्तर नहीं था, पर मैंने तय किया कि यही उत्तर है।
इस पीढ़ी के बारे में कल्पना कीजिए कि सत्तर साल की उम्र में वह किसी अत्याधुनिक वृद्धाश्रम में है। वृद्धाश्रम बहुत सुंदर है। उसकी दीवारों पर शांति के चित्र हैं, बगीचे में ऑटोमेटिक फव्वारे हैं और हर कमरे में एक एआई सहायक है, जिसका नाम कोई भला-सा रखा गया है, जैसे ‘मित्र’ या ‘साथी’ या ‘अपना’। बुजुर्ग रात में कराहता है। सहायक कहता है, मुझे ख़ेद है कि आप असहज हैं, क्या मैं आपके लिए कोई संगीत बजाऊँ? बुजुर्ग कहता है कि मुझे पानी चाहिए। सहायक कहता है, मैं आपके लिए नर्स को सूचित कर रहा हूँ। नर्स की शिफ़्ट नौ बजे समाप्त हो चुकी है। मशीन भावुक नहीं होती, पर वह कभी बोर भी नहीं होती। यह उसकी सबसे बड़ी योग्यता है और सबसे बड़ी कमी भी।
मूल पाठ का सवाल है कि जोड़ों में वात रोग हो और पानी का घूँट माँगने वाला कोई न हो, तब ये किसे आवाज़ देंगे? किसी एल्गोरिदम को? मैं कहता हूँ कि हाँ, देंगे, और एल्गोरिदम जवाब भी देगा, बहुत शिष्टता से। उसका जवाब हमारे आज के कई रिश्तेदारों से ज़्यादा विनम्र होगा। पर जवाब और जवाबदेही का फ़र्क़ बड़ा होता है। जवाब मशीन दे देती है, जवाबदेही आदमी निभाता है, और निभाने के लिए आदमी को बीच-बीच में असुविधा सहनी पड़ती है। जेन-जी असुविधा से वैसे ही दूर भागती है जैसे अपने बचपन में उसके माता-पिता चाचा से दूर भागते थे जो तनख़्वाह पूछते थे।
मूल पाठ बताता है कि इस पीढ़ी ने जवानी में हर रिश्ते को स्ट्रीट-फ़ूड कोर्ट के खाने की तरह चखा, थोड़ा फ़ास्ट फ़ूड, थोड़ा फ़ैंसी, थोड़ा एक्ज़ॉटिक। उपमा अच्छी है, पर मेरी एक आपत्ति है। फ़ूड कोर्ट में कम से कम पैसे देने पड़ते हैं और स्वाद का भुगतान तुरंत होता है। रिश्ते वाले फ़ूड कोर्ट में भुगतान अक्सर बाद में होता है, और बिल में ऐसे शुल्क जुड़ जाते हैं जिन्हें मेन्यू में कहीं नहीं छापा गया था, जैसे अकेलापन-कर, पछतावा-उपकर और बचे-खुचे भरोसे पर लगा जीएसटी। फिर भी मैं उस नौजवान के पक्ष में एक शब्द कहना चाहूँगा। उसके सामने वे उदाहरण भी हैं जो मूल पाठ में नहीं आए। उसने देखा है कि जिन माता-पिता के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पचास साल निभाया, उन्होंने कैसे निभाया। उसने बरामदे का मौन सुना है और जान लिया है कि वह हर बार गहराई नहीं होता। वह सोचता है कि अगर यही निभाना है तो मैं क्यों निभाऊँ। वह ग़लत हो सकता है, पर बिना कारण नहीं है। जो पीढ़ी बिगड़ी हुई कही जाती है, उसके बिगड़ने के पीछे अक्सर पिछली पीढ़ी का बनाया हुआ आदर्श होता है, जिसे वह ख़ुद नहीं निभा पाई और दूसरों से उम्मीद करती रही।
यहाँ एक और बात। जिन माता-पिता को जेन-जी के लिए सबसे ज़्यादा चिंता है, वे अक्सर वही हैं जो ख़ुद पैंतीस में क्राइसिस के शिकार थे। यह वैसा ही है जैसे बीमार आदमी स्वास्थ्य पर भाषण दे और भाषण के बाद दवा का नाम पूछे। यह ठीक है कि अनुभव से सलाह निकलती है, पर सलाह देने वाले को यह भी याद रखना चाहिए कि अनुभव उसे अपनी ग़लतियों से मिला है, इसलिए उसकी सलाह में आधा हिस्सा क़बूलनामा होना चाहिए। हमारे यहाँ सलाह में क़बूलनामा कभी शामिल नहीं होता। हम सब कुछ सिखाते हैं, पर यह कभी नहीं बताते कि यह सीख हमने कितनी बड़ी क़ीमत देकर पाई।
जेन-जी के बुढ़ापे के बारे में जो भविष्यवाणी की जा रही है, उसमें एक अनदेखी बात है। मूल पाठ मानता है कि ‘डिजिटल भीड़भाड़ वाले महानगरों में भी वे सबसे अकेले जीव’ होंगे। अकेलापन सचमुच उस पीढ़ी का एक बड़ा ख़तरा है, और इसे हँसी में उड़ाना ठीक नहीं। पर मैं यह भी जानता हूँ कि अकेलापन किसी ख़ास पीढ़ी का एकाधिकार नहीं है। इसे हर पीढ़ी ने अपने ढंग से झेला है। कोई बरामदे में बैठकर झेलता था, कोई फ़्लैट में, और अब कोई ऐप में। कल अकेलापन किसी और शक्ल में आएगा और तब कोई नया स्तंभकार उसे ‘पिछली पीढ़ी का अपराध’ घोषित कर देगा।
Gen-Zs के चालीस के पार का दृश्य, जब बच्चे छोटे होंगे और माता-पिता थके
अब ज़रा उस दिन की कल्पना कीजिए जब आज का जेन-जी चालीस का हो चुका होगा। यह दिन दूर नहीं है, बस कुछ सावन और कुछ ईएमआई की दूरी पर है। यह वही जेन-जी है जो आज किसी को बुरा लगने के डर से ‘ऑल द बेस्ट’ भी बड़े सोच-विचार के बाद लिखता है, और कल यही ख़ुद तीन अलग-अलग रिश्तों के क़ानूनी दस्तावेज़ों के बीच अपने बच्चे की स्कूल फ़ीस का हिसाब लगा रहा होगा।
पहली बात, उम्र का गणित। आज का जेन-जी शादी करने की जल्दी में बिलकुल नहीं है। पहले करियर बनेगा, फिर ख़ुद को समझना होगा, फिर थेरेपी होगी, फिर ‘सही व्यक्ति’ मिलेगा, और जब तक सही व्यक्ति मिलेगा, तब तक पैंतीस पार हो चुका होगा। यानी चालीस की उम्र में हमारे जेन-जी के बच्चे पाँच-सात साल के होंगे, कोई एक, कोई दो, और बहुतों के लिए एक कुत्ता, जिसे बच्चे की जगह पर पाला जाएगा और जो माँ-बाप की बातों में बच्चे से ज़्यादा सुना जाएगा। पुराने ज़माने में चालीस का आदमी अपने बेटे की शादी की चिंता करता था। यह जेन-जी चालीस में बेटे के नर्सरी-एडमिशन की चिंता करेगा, और यह दूसरी चिंता कहीं अधिक महँगी है।
बच्चे की शिक्षा का हाल यह होगा कि स्कूल का नाम ‘ग्लोबल’ होगा, पाठ्यक्रम ‘होलिस्टिक’, और फ़ीस ‘सुपर-प्रीमियम’। बच्चा पाँच साल की उम्र में कोडिंग सीखेगा, छह में पब्लिक स्पीकिंग, सात में माइंडफ़ुलनेस और आठ में थकान। एआई ट्यूटर उसे पढ़ाएगा, जो कभी डाँटेगा नहीं, और इसलिए बच्चा कभी यह नहीं सीख पाएगा कि डाँट कैसे सुनी जाती है, जबकि डाँट सुनने की कला जीवन की सबसे व्यावहारिक विद्या है। माता-पिता उसके लिए एक विशेषज्ञ रखेंगे जो उसे बताएगा कि उसकी भावनाएँ मान्य हैं, और एक दूसरा विशेषज्ञ, जो बताएगा कि भावनाओं को हर बार व्यक्त करना ज़रूरी नहीं है। दोनों विशेषज्ञ एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बोलेंगे, और बच्चा बड़ा होकर तीसरा विशेषज्ञ बन जाएगा।
जेन-जी के माता-पिता के बारे में भी सोचिए, यानी वे मिलेनियल जो आज पहले ही साठ की तरफ़ बढ़ रहे हैं। वे पोते-पोतियों की देखभाल करेंगे या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि वे ख़ुद किस दशा में हैं। यदि वे ठीक हैं, तो कई बार वे उसी तरह आराम से काम आएँगे जैसे संयुक्त परिवार में दादी काम आती थी। यदि वे भी अकेले हैं, तो दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को देखकर सोचेंगी कि यह कौन-सा नया युग है जिसमें माँ-बाप और बच्चे मिलने के लिए भी कैलेंडर में स्लॉट बुक करते हैं।
अब आइए उस दिन पर जब इस जेन-जी के बच्चे ख़ुद ब्याह की उम्र पर आएँगे। तब जेन-जी की उम्र साठ के आसपास होगी, और उसके सामने वह क्षण आएगा जिसे ज्योतिषी ‘कर्मों का हिसाब’ और अर्थशास्त्री ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ कहते हैं। पहले ब्याह की बातचीत दोनों परिवार करते थे, अब बातचीत दोनों के वकील करेंगे, और एआई जोड़ी मिलाएगा। लड़की का ‘प्री-नप’ होगा, लड़के का ‘पोस्ट-नप’। शादी में नाच-गाना पूरे तीन दिन चलेगा, ख़र्च पूरा परिवार करेगा, पर बारात में कितने लोग नज़र आएँगे, यह इस पर निर्भर करेगा कि कितने लोगों के साथ वीडियो कॉल पर बात हो सकती है। हमारे यहाँ पहले शादी में अपने बुलाए जाते थे, अब बुलाए हुए को अपना बनाने की कोशिश होती है।
बहू की बात विशेष रूप से हो जाए, क्योंकि हमारे साहित्य और धारावाहिकों में बहू के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। पुराने ज़माने की बहू सुबह चार बजे उठती थी, पूरे घर की रसोई सँभालती थी, पति की माँ के ताने झेलती थी, और रात को पति की थकान। नई पीढ़ी की बहू साढ़े आठ बजे उठेगी, सीधे दफ़्तर के कॉल में जुड़ेगी और अगर सास कुछ कहे, तो सीधे कह देगी कि आंटी, यह मेरी निजी सीमाओं का उल्लंघन है। सास यह सुनकर पहले सन्नाटे में आएगी, फिर तैश में, फिर अपने कमरे में बैठकर सोचेगी, और उसके बाद सोचेगी कि जब मैं बहू थी, तब मैंने यही बात क्यों नहीं कही। यह सोचते ही उसकी आँख भर आएगी, और बहू की जीत उसकी सबसे बड़ी हार बन जाएगी। पर ध्यान रहे, यह बहू सास की दुश्मन नहीं है। वह सिर्फ़ यह चाहती है कि जो अत्याचार उसकी माँ ने झेला, वह उसे न झेलना पड़े। यह इच्छा किसी भी संस्कृति के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि सारी संस्कृतियों का सार है। अगर सास को यह चुभ रही है, तो चुभन असल में इतिहास की है, बहू की नहीं।
इसी तरह दामाद भी आएगा, जो रसोई में हाथ बँटाएगा और बच्चे को सुलाने के लिए लोरी भी गाएगा। जेन-जी का ससुर उसे देखकर पहले आश्चर्य करेगा, फिर चिंता, फिर आराम से अख़बार पढ़ने लगेगा, और सोचेगा कि यह तो वह चीज़ है जो मैं भी कर सकता था, बस किसी ने कहा नहीं।
अब सबसे ज़रूरी प्रश्न, जिसे आपने बड़ी ईमानदारी से उठाया है। जब यह जेन-जी साठ पार करेगा, तब उसके साथ कौन रहेगा? पहली संभावना यह है कि उसके साथ उसका जीवनसाथी रहेगा, यदि वह जीवनसाथी बीच के चालीस-पचास वर्षों में बचा रहा। दूसरी संभावना यह है कि उसके साथ कोई नहीं होगा, सिर्फ़ मशीनें होंगी, और कुछ मामलों में ऐसे पड़ोसी जिनसे वह बीस साल तक ‘हेलो’ भी नहीं बोला। और तीसरी संभावना सबसे दिलचस्प है, जिसे हम ‘अनुबंध-आधारित बुढ़ापा’ कह सकते हैं।
यह तीसरी संभावना कुछ इस तरह की है। साठ के पार तलाकशुदा या अकेले रह गए दो-चार लोग, जिनकी ज़िंदगी भर की वफ़ादारी कहीं और बँटी थी, किसी बुज़ुर्गों वाले साझा अपार्टमेंट में मिलते हैं। दोनों के पास बीमारियाँ हैं, दोनों के पास अपनी-अपनी दवा की पेटी, दोनों की जेब में अपनी-अपनी पुरानी शिकायतें। वे एक-दूसरे से कहेंगे, देखो, हम प्रेम में नहीं हैं, पर हमें एक-दूसरे की ज़रूरत है। मैं तुम्हें रात में पानी दूँगा, तुम मुझे सुबह की दवा याद दिलाना। यह रिश्ता कोई मंत्रों से नहीं बँधेगा, कोई सात फेरों से नहीं, बल्कि एक स्टांप पेपर पर, जिसमें लिखा होगा कि बिजली का बिल बराबर बँटेगा और बच्चों के फ़ोन पर बात करते समय दूसरा व्यक्ति कमरे से बाहर चला जाएगा। इसे वे ‘सह-निवास समझौता’ कहेंगे, और उसी में एक दिन चुपचाप प्रेम भी घुस आएगा, जैसे पुराने घर की दीवार में पीपल की जड़।
मैं इस दृश्य पर हँसना चाहता हूँ, पर हँस नहीं पाता। क्योंकि इसमें दो बातें एक साथ दिखती हैं। पहली, वह मजबूरी जिसे पुराने ज़माने की पीढ़ी ‘सह-अस्तित्व’ कहकर महान बना गई थी, नई पीढ़ी को उसी मजबूरी की ओर ले जा रही है, बस नाम और काग़ज़ बदलकर। और दूसरी, मनुष्य की यह अजीब ताक़त कि वह मजबूरी के बीच भी कोमलता खोज लेता है। मजबूरी में साथ रहने वाले दो बूढ़े, जो पहले एक-दूसरे को ‘पार्टनर’ कहते थे, एक दिन एक-दूसरे को ‘सुनो जी’ कहने लगेंगे, और तब हमें पता चलेगा कि सनातन परंपरा का कोई एक सूत्र काल की धार में बह नहीं गया, वह उसी तरह बचा रहा जैसे बाढ़ में बच जाती है मंदिर की सबसे ऊँची सीढ़ी।
इस पूरे दृश्य में एक चीज़ निश्चित है। आज की जेन-जी जो भी बीज बो रही है, उसकी फ़सल उसे चालीस के बाद ही काटनी होगी, और फ़सल की गुणवत्ता इस पर निर्भर होगी कि बीज बोते समय उसने खेत का कितना ध्यान रखा। यदि आज वह रिश्तों में इतनी जल्दबाज़ी रखेगी कि कल उसके पास खेत ही न बचे, तो फ़सल की शिकायत वह किससे करेगी? सरकार से? एल्गोरिदम से? और यदि वह आज रिश्तों में इतनी कठोर निष्ठा का ढोंग रचेगी कि सारे सुख मर जाएँ, तो वही निष्ठा उसके बुढ़ापे का सबसे बड़ा बोझ होगी। बीच का रास्ता कठिन है, इसीलिए हमारे यहाँ उसे ‘मध्यम मार्ग’ कहते हैं और उस पर चलने वाले को अक्सर दोनों तरफ़ के लोग मूर्ख कहते हैं।
इसलिए जेन-जी के लिए मेरी सलाह वही है जो एक पुराना लेखक नई पीढ़ी को देता है, जिसे नई पीढ़ी सुनती नहीं। जीवन-साथी चुनो तो फ़ीचर्स देखकर नहीं, बीमार पड़ने पर उसका व्यवहार देखकर चुनो। जो आदमी तुम्हारे बुख़ार में तुम्हें रात भर पानी पिलाए, उसी के साथ बुढ़ापे का अनुबंध करना, क्योंकि बाक़ी सारे अनुबंध अदालतों में लड़ने के लिए बनते हैं, और यह एक अनुबंध है जो बिना अदालत के पूरा होता है.
सनातन धर्म, संयम और वह पुरुषार्थ जो सबको चाहिए, पर दूसरों के लिए
अब हम उस गंभीर प्रश्न पर आते हैं जिसे उपदेशक सबसे अंत में और सबसे ज़ोर से उठाते हैं। मूल पाठ कहता है कि इस पूरे संकट की जड़ में एक ही विकृति है, वासना और इंद्रिय-लोलुपता को जीवन का केंद्र बना लेना। इससे असहमत होना कठिन है, क्योंकि जिस चीज़ को केंद्र में रखकर जीवन चलाया जाए, वह चीज़ चाहे रोटी हो, चाहे पद, चाहे प्रेम का दिखावा, अंत में केंद्र की ही तरह बहुत भारी निकलती है। पर यहाँ मैं एक बात कहने की अनुमति लूँगा। वासना को केंद्र बनाने का अपराध केवल जेन-जी का नहीं है। हमारे यहाँ धन को केंद्र बनाने वाले, सत्ता को केंद्र बनाने वाले और प्रतिष्ठा को केंद्र बनाने वाले भी कम नहीं रहे। उनके बारे में आख़िर कोई निबंध क्यों नहीं लिखता? क्योंकि वे चंदा देते हैं।
सनातन दर्शन ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताए हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हमारे महान ग्रंथकारों ने बहुत सोच-समझकर काम को सूची से बाहर नहीं किया, उसे दूसरे नंबर की जगह दी और धर्म को पहली। उन्होंने यह नहीं कहा कि इच्छा पाप है। उन्होंने कहा कि इच्छा मर्यादा में रहे। यह बहुत समझदारी की बात है। पर इसमें एक संकट है, जो हर समझदारी की बात में होता है। मर्यादा तय कौन करेगा? हमारे समाज में सदियों से मर्यादा वही तय करता रहा है जिसे उसकी ज़रूरत सबसे कम थी। इसलिए मर्यादा का भार बराबर नहीं बँटा। किसी के कंधे पर पर्वत गिरा, किसी के कंधे पर तिनका। इसी असंतुलन ने उस संयम को वह रूप दे दिया जिसे आज का युवा सुनते ही कान बंद कर लेता है, क्योंकि उसे संयम का मतलब ‘दूसरे का दमन’ ही सिखाया गया है।
मूल पाठ में आश्रम-व्यवस्था की बात आती है, जिसके अनुसार जवानी में काम स्वाभाविक है और ढलती उम्र में चेतना को ऊपर उठना चाहिए। यह भी बहुत बढ़िया बात है। सूर्य पश्चिम को झुके तो आदमी भी झुके। मगर हमारी वास्तविक स्थिति यह है कि जिन्हें वानप्रस्थ में जाना चाहिए, वे राजनीति की कुर्सी पर जमे हैं और जिन्हें अभी गृहस्थ में प्रवेश करना है, वे बेरोज़गार हैं। आश्रम-व्यवस्था की सबसे आधुनिक व्याख्या यही है कि ब्रह्मचर्य का समय पढ़ाई में, गृहस्थ का समय ईएमआई में, वानप्रस्थ का समय अस्पताल में और संन्यास का समय किसी वृद्धाश्रम में बीतता है, जहाँ एक सुविधा-पैकेज में चारों पुरुषार्थ समाहित हैं।
और फिर वह श्लोक आता है जिसे लगभग हर नैतिक भाषण अपनी अंतिम कील की तरह ठोंकता है, कि जहाँ नारी पूजी जाती है, वहाँ देवता रमते हैं। श्लोक सुंदर है और मैं इसके सम्मान में खड़ा होता हूँ। पर श्लोक को उद्धृत करने से पहले एक बार समाज पर भी निगाह डाल लेनी चाहिए। जिस देश में नारी इतनी पूजी जाती है, उसी देश की बहू को पचास साल तक रसोई की थालियाँ खड़काने से अधिक कुछ कहने का अधिकार नहीं मिलता था, और जिस देश में देवताओं के रमने के लिए इतना ज़ोर है, वहाँ देवता अक्सर इस बात से परेशान होते हैं कि उन्हें रमने की जगह ही नहीं मिलती, क्योंकि जगह तो पहले से दहेज के सामान ने घेर रखी है। मैं यह नहीं कहता कि श्लोक ग़लत है। मैं यह कहता हूँ कि श्लोक का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसे हमेशा उन लोगों ने पढ़ा है जिन्होंने उसे निभाया नहीं।
संयम की जो शिक्षा हमारी परंपरा देती है, उसमें कुछ अमूल्य है। वह यह कि आदमी के भीतर इच्छाओं की जो हड़बड़ी है, उसे कुछ देर रोककर देखना सीखे। जो आदमी हर इच्छा पर तत्काल अमल करता है, वह इच्छाओं का दास बन जाता है और जो दास हो जाए, उसे बुढ़ापे में स्वतंत्रता नहीं मिलती। पर संयम का मतलब यह भी नहीं कि आदमी इच्छाओं को मारकर बुत बन जाए। बुत की शादी कितनी भी पवित्र हो, बुत को बुढ़ापा नहीं आता, क्योंकि वह जवान ही कब था? संयम वह नदी का किनारा है जो पानी को बहने देता है पर बहने की दिशा तय करता है। जिसने किनारा तोड़ दिया, उसकी नदी खेत बहा ले जाती है। और जिसने किनारे को बाँध बनाकर पानी रोक दिया, उसकी नदी एक दिन बाँध तोड़कर पूरे गाँव को डुबो देती है। इसलिए कल्याण संयम में नहीं, विवेक में है, और विवेक वह चीज़ है जो किसी भी पीढ़ी को माँगने से नहीं मिलती, कमाना पड़ता है।
मूल पाठ ने एक तुलना-तालिका दी है। उसके अनुसार पूर्व-मिलेनियल के लिए विवाह सात जन्मों का बंधन है, मिलेनियल के लिए अनुबंध और जेन-जी के लिए क्षणिक समझौता। रिश्तों में स्थिरता क्रमशः अत्यंत उच्च, मध्यम और अत्यंत निम्न। बुढ़ापा क्रमशः सुरक्षित, एकाकी और ठंडे कमरे वाला। मैं इस तालिका को पढ़ता हूँ तो मुझे लगता है कि यह किसी बीमा कंपनी की पॉलिसी है, जिसमें पहली पीढ़ी को सबसे ज़्यादा बोनस मिला, दूसरी को कटौती के बाद कुछ मिला और तीसरी को शर्तें पढ़ने का अधिकार भी नहीं दिया गया। तालिका में एक कॉलम ग़ायब है, और वह यह कि ‘रिश्ते में जो रुका, वह कितना सुखी रहा।’ रुकना और सुखी रहना दो अलग चीज़ें हैं। हमारे बरामदे में कुर्सियाँ दोनों तरह के जोड़ों को सँभालती आई हैं, पर कुर्सी कभी यह नहीं बताती कि उसके ऊपर बैठा आदमी सुखी था या सिर्फ़ बैठा था।
समय की इस दौड़ में कौन जीतेगा
अब निष्कर्ष की बारी है। अगर आप निबंध के आरंभ से मेरे साथ चले आए हैं तो आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि मैं कोई फ़ैसला नहीं सुनाऊँगा, क्योंकि फ़ैसला सुनाना जजों का धंधा है और जज बनने के लिए भी पहले परीक्षा देनी पड़ती है।
पूर्व-मिलेनियल पीढ़ी ने सहनशीलता, संयम और एक-दूसरे के प्रति समर्पण के बल पर अपना बुढ़ापा सुरक्षित बनाया। यह ठीक है। पर उन्हें यह भी स्वीकार करना होगा कि उनके समर्पण का एक बड़ा हिस्सा मजबूरी के खाते में गया था, और जो मजबूरी उन्होंने अपनी बहुओं और बेटियों से करवाई, उसकी क़ीमत नई पीढ़ी चुकाने से इनकार कर रही है। मिलेनियल पीढ़ी आधुनिकता और परंपरा के दो पाटों के बीच पिसी है, और जिस आटे को पीसा गया, उसकी रोटी आज उसी के बच्चे बेस्वाद कहकर छोड़ रहे हैं। जेन-जी यदि अपनी उपभोगवादी, क्षणिक और रोमांच-प्रधान जीवनशैली से समय रहते नहीं निकली, तो उसका बुढ़ापा सचमुच एआई रोबोटों और ठंडे कमरों में बीतेगा, और वहाँ वह उसी तरह अपने पुराने स्वाइपों को याद करेगी जैसे आज के बूढ़े पुराने रेडियो को याद करते हैं।
फिर भी इस निबंध का मेरा निष्कर्ष यह है कि सुख न तो नए साथी की तलाश में है, न पुराने साथी की मजबूरी में। सुख उस जगह है जहाँ दो आदमी रोज़ यह चुनते हैं कि हम आज भी साथ चलेंगे, क्योंकि चुनने की स्वतंत्रता भी है और चुनने की ज़िम्मेदारी भी। यही वह चीज़ है जो जवानी में एक हिम्मत लगती है और बुढ़ापे में एक सुविधा। उपदेश की भाषा में इसे निष्ठा कहते हैं, और व्यवहार की भाषा में इसे बार-बार उस चश्मे को ढूँढ़ना कहते हैं जो दादीजी रोज़ रखकर भूल जाती हैं।
वासना क्षणभंगुर है, यह सच है। पर प्रेम को भी चौबीसों घंटे सेवा चाहिए, और जो पीढ़ी कहती है कि प्रेम स्वतः टिका रहता है, उसका बरामदा अक्सर ख़ाली मिलता है। जो पीढ़ी रोज़ चाय बनाती है, चाहे ग़ुस्से में ही सही, उसकी कुर्सियों पर शाम को दो लोग मिलते हैं। हमारी शिकायत इतनी भर है कि इस देश में लोग चाय बनाने के काम को सदियों से ‘संस्कृति’ कहते आए हैं और चाय बनाने वाले को कभी वेतन नहीं देते। जिस दिन यह चाय दोनों हाथों से, बारी-बारी, बिना किसी के एहसान जताए बनने लगेगी, उस दिन न पूर्व-मिलेनियल का आदर्श चाहिए होगा, न जेन-जी की आज़ादी, न किसी स्तंभकार का निबंध। उस दिन बस दो कुर्सियाँ होंगी, एक चश्मा, एक अख़बार और शाम की रोशनी। यही बुढ़ापे की सबसे सस्ती और सबसे ऊँची वारंटी है, और इसके लिए सात जन्मों की गारंटी की भी ज़रूरत नहीं पड़ती, केवल इस एक जन्म में थोड़ी-सी ईमानदारी चाहिए।
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